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उत्तराखंडी फिल्म ‘मंगल एक पहाड़ी’ की दिल्ली-NCR में धूम, देवा धामी के संवाद और गीतों की चर्चा

उत्तराखंड की मिट्टी, भाषा और पहाड़ी जीवन की झलक अब बड़े पर्दे के जरिए दिल्ली-NCR के दर्शकों तक पहुंच रही है। उत्तराखंडी फीचर फिल्म ‘मंगल एक पहाड़ी’ की रिलीज के बाद राजधानी और आसपास के क्षेत्रों में इसे लेकर उत्साह देखने को मिल रहा है। फिल्म की कहानी, पहाड़ी अंदाज में बोले गए संवाद और लोकधुनों से जुड़े गीत दर्शकों के बीच चर्चा का विषय बने हुए हैं। खास बात यह है कि फिल्म केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, रहन-सहन और लोगों की सादगी को भी पर्दे पर सामने लाती है।

30 अक्टूबर को फिल्म दिल्ली, रुद्रपुर, अल्मोड़ा और देहरादून में रिलीज की गई। अलग-अलग शहरों में इसकी रिलीज के साथ उत्तराखंडी सिनेमा को नए दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिश भी आगे बढ़ी है। दिल्ली में फिल्म का शुभारंभ समाजसेवी विनोद कप्टियाल और समाजसेवी ऊषा ममगाईं की गरिमामयी उपस्थिति में हुआ। इस मौके पर उत्तराखंड से जुड़ी कई जानी-मानी हस्तियां और गणमान्य लोग भी मौजूद रहे।

दिल्ली में खास अंदाज में हुआ फिल्म का शुभारंभ

राजधानी दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान और क्षेत्रीय सिनेमा को लेकर उत्साह नजर आया। समाजसेवी विनोद कप्टियाल और ऊषा ममगाईं की मौजूदगी ने कार्यक्रम को खास बनाया। इस अवसर पर उत्तराखंड के लोकप्रिय गायक सतेंद्र पराण्डिया भी उपस्थित रहे।

फिल्म से जुड़े लोगों और उत्तराखंडी समाज के प्रतिनिधियों की मौजूदगी ने यह संदेश दिया कि अपनी भाषा और संस्कृति पर आधारित फिल्मों को दर्शकों तक पहुंचाने में सामूहिक प्रयास की अहम भूमिका है। दिल्ली जैसे महानगर में किसी क्षेत्रीय भाषा की फिल्म का प्रदर्शन वहां रहने वाले प्रवासी उत्तराखंडियों के लिए अपनी जड़ों से जुड़ने का एक अवसर भी बनता है।

‘अल्मोड़ी बाजारा’ गीत ने खींचा दर्शकों का ध्यान

फिल्म के गीतों में सतेंद्र पराण्डिया की आवाज में गाया गया गीत ‘अल्मोड़ी बाजारा’ खास चर्चा में है। पहाड़ के बाजारों, वहां की जीवनशैली और स्थानीय रंगों की याद दिलाने वाला यह गीत श्रोताओं को उत्तराखंड के माहौल से जोड़ता है।

उत्तराखंडी लोकसंगीत की अपनी अलग पहचान रही है। यहां के गीतों में स्थानीय बोली, पारंपरिक धुनों और रोजमर्रा के जीवन की झलक देखने को मिलती है। ‘मंगल एक पहाड़ी’ का यह गीत भी इसी सांस्कृतिक रंग को सामने लाता है। फिल्म के अन्य गीतों को भी दर्शकों से अच्छी प्रतिक्रिया मिलने की बात सामने आई है।

देवा धामी के ‘मंगल’ किरदार का संवाद बना चर्चा का विषय

फिल्म में मुख्य अभिनेता देवा धामी ने ‘मंगल’ का किरदार निभाया है। उनके अभिनय के साथ-साथ फिल्म में बोले गए संवाद भी दर्शकों के बीच लोकप्रिय हो रहे हैं। खास तौर पर उनका एक संवाद लोगों का ध्यान खींच रहा है—

“हमारे पहाड़ में सड़कें जरूर टेढ़ी-मेढ़ी ठहरी, लेकिन लोग बहुत सीधे हैं।”

यह संवाद पहाड़ के भूगोल और वहां के लोगों के स्वभाव को बेहद सरल अंदाज में बयान करता है। उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में घुमावदार रास्ते, ऊंचे-नीचे पहाड़ और कठिन भौगोलिक परिस्थितियां आम जीवन का हिस्सा हैं। इसके बावजूद यहां के लोगों की सादगी, अपनापन और मेहमाननवाजी उनकी खास पहचान मानी जाती है।

संवाद की यही सहजता इसे दर्शकों से जोड़ती है। पहाड़ से दूर रहने वाले उत्तराखंडियों के लिए इसमें अपने गांव और वहां के लोगों की यादें भी छिपी हैं, जबकि दूसरे दर्शकों को यह पहाड़ी जीवन की एक अलग तस्वीर दिखाता है।

पिथौरागढ़ से शुरू हुआ सफर अब दिल्ली-NCR तक पहुंचा

‘मंगल एक पहाड़ी’ का सफर पिथौरागढ़ से शुरू हुआ था। वहां फिल्म को दर्शकों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली। अब दिल्ली-NCR के साथ रुद्रपुर, अल्मोड़ा और देहरादून में रिलीज होने से इसका दायरा और बढ़ा है।

उत्तराखंड की क्षेत्रीय फिल्मों के सामने अक्सर सीमित स्क्रीन, वितरण और प्रचार जैसी चुनौतियां रहती हैं। ऐसे में राज्य से बाहर के शहरों में फिल्म का प्रदर्शन स्थानीय सिनेमा के लिए महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। दिल्ली-NCR में उत्तराखंड के बड़ी संख्या में लोग रहते हैं। ऐसे दर्शकों के लिए अपनी बोली, संस्कृति और पहाड़ के परिवेश को पर्दे पर देखना एक भावनात्मक अनुभव भी हो सकता है।

क्षेत्रीय सिनेमा को मिल रहा नया मंच

पिछले कुछ वर्षों में क्षेत्रीय सिनेमा को लेकर दर्शकों की दिलचस्पी बढ़ी है। स्थानीय कहानियां, अपनी भाषा और परिचित परिवेश जब फिल्मों का हिस्सा बनते हैं, तो वे दर्शकों के साथ एक अलग तरह का जुड़ाव पैदा करते हैं। उत्तराखंडी सिनेमा के लिए भी यह समय अपनी पहचान को व्यापक स्तर पर स्थापित करने का अवसर है।

‘मंगल एक पहाड़ी’ को मिल रही प्रतिक्रिया इसी दिशा में एक उत्साहजनक संकेत है। फिल्म के गीतों और संवादों की चर्चा बताती है कि स्थानीय रंग और पहाड़ी अंदाज बड़े शहरों के दर्शकों तक भी पहुंच बना सकते हैं।

फिलहाल फिल्म की रिलीज के बाद दर्शकों के बीच इसकी कहानी, संगीत और किरदारों को लेकर चर्चा जारी है। पिथौरागढ़ से शुरू होकर दिल्ली-NCR तक पहुंचा ‘मंगल एक पहाड़ी’ का सफर उत्तराखंड की कहानियों को बड़े पर्दे पर पहचान दिलाने की कोशिश का एक हिस्सा है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि फिल्म को दूसरे शहरों में कैसा प्रतिसाद मिलता है और उत्तराखंडी सिनेमा अपने दर्शकों का दायरा कितना बढ़ा पाता है।

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