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उत्तराखंड: शिक्षकों ने टीईटी अनिवार्यता के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करने का निर्णय लिया पुनर्विचार याचिका

शिक्षा को समाज की रीढ़ कहा जाता है। देश की प्रगति और बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए अच्छे शिक्षक सबसे बड़ी आवश्यकता होते हैं। लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा फैसला दिया है, जिससे देशभर के लाखों शिक्षक प्रभावित हो रहे हैं। कोर्ट ने यह आदेश दिया है कि अब सभी शिक्षकों के लिए टीईटी (Teacher Eligibility Test) पास करना अनिवार्य होगा। इस फैसले के बाद शिक्षकों के बीच असंतोष फैल गया है। उनका कहना है कि पहले से सेवा कर रहे शिक्षकों के लिए इस तरह की बाध्यता उचित नहीं है।

टीईटी क्यों अनिवार्य किया गया?

टीईटी को अनिवार्य करने का मुख्य उद्देश्य शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना है। सरकार और न्यायालय का मानना है कि जब तक शिक्षक एक निर्धारित मानक के अनुसार योग्य नहीं होंगे, तब तक बच्चों को बेहतर शिक्षा नहीं मिल पाएगी। टीईटी पास करने से यह सुनिश्चित होता है कि शिक्षक के पास बच्चों को पढ़ाने के लिए न्यूनतम योग्यता और क्षमता है।

लेकिन, दूसरी तरफ पहले से लंबे समय से कार्यरत शिक्षक यह मानते हैं कि अनुभव सबसे बड़ा शिक्षक होता है। उन्होंने 15-20 साल बच्चों को पढ़ाकर अपना जीवन शिक्षा को समर्पित किया है। ऐसे में अचानक से टीईटी को अनिवार्य कर देना उनके साथ अन्याय जैसा लगता है।

शिक्षकों की नाराज़गी

शिक्षक संगठनों का कहना है कि यह फैसला लाखों शिक्षकों की आजीविका पर संकट खड़ा कर देगा। कई शिक्षक ऐसे हैं, जो अब सेवा निवृत्ति (रिटायरमेंट) के करीब हैं। अगर उन्हें अब जाकर टीईटी की परीक्षा देनी पड़ेगी और किसी कारणवश वे पास नहीं कर पाए, तो उनकी नौकरी खतरे में आ सकती है।

ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ टीचर्स ऑर्गेनाइजेशन के राष्ट्रीय संगठन मंत्री डॉ. सोहन माजिला ने कहा है कि यह फैसला शिक्षकों के साथ नाइंसाफी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संगठन इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर करेगा। उनका कहना है कि जिन शिक्षकों की सेवा अवधि 20 साल से भी अधिक हो चुकी है, उन्हें पदोन्नति (प्रमोशन) से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

सेवा का अनुभव बनाम परीक्षा

यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कई साल का अनुभव टीईटी जैसी परीक्षा से कमतर है?

जिन शिक्षकों ने वर्षों तक बच्चों को पढ़ाया है, क्या उनकी योग्यता पर सवाल उठाना सही है?

क्या एक परीक्षा यह तय कर सकती है कि कोई शिक्षक अच्छा है या नहीं?

क्या लंबे अनुभव को नजरअंदाज कर केवल परीक्षा पास करने वालों को योग्य मानना उचित है?

शिक्षकों का मानना है कि किसी भी पेशे में अनुभव की अहमियत होती है। जैसे डॉक्टर, इंजीनियर या वकील—सभी को समय के साथ अनुभव से विशेषज्ञ माना जाता है। ठीक वैसे ही शिक्षा के क्षेत्र में भी वर्षों की सेवा और बच्चों के साथ काम करने का अनुभव एक बड़ी उपलब्धि है।

कोर्ट और सरकार की सोच

सुप्रीम कोर्ट और सरकार का कहना है कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना बेहद जरूरी है। आज के समय में प्रतियोगी परीक्षाओं, तकनीक और नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत शिक्षकों का अपडेटेड होना अनिवार्य है। इसके लिए टीईटी जैसी परीक्षाएं एक फिल्टर की तरह काम करती हैं।

लेकिन, आलोचकों का कहना है कि यदि गुणवत्ता सुधारना ही लक्ष्य है, तो इसके लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम (Training Programs), कार्यशालाएं (Workshops) और समय-समय पर शिक्षकों के लिए अपस्किलिंग कोर्स (Upskilling Courses) शुरू किए जा सकते हैं। केवल एक परीक्षा लेना ही समाधान नहीं है।

पुनर्विचार याचिका की तैयारी

ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ टीचर्स ऑर्गेनाइजेशन ने निर्णय लिया है कि वे सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करेंगे। उनका कहना है कि कोर्ट को यह देखना होगा कि पहले से सेवा कर रहे शिक्षकों के लिए अलग व्यवस्था होनी चाहिए।

संगठन यह मांग करेगा कि 10 साल से अधिक सेवा देने वाले शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से छूट दी जाए।

जिन शिक्षकों की सेवा अवधि 5 से 10 साल है, उन्हें प्रशिक्षण देकर योग्य घोषित किया जाए।

केवल नए भर्ती होने वाले शिक्षकों के लिए टीईटी अनिवार्य हो।

इस तरह, पुरानी और नई पीढ़ी के शिक्षकों के बीच संतुलन भी बना रहेगा और शिक्षा की गुणवत्ता भी बनी रहेगी।

शिक्षकों का भविष्य और छात्रों पर असर

यदि यह फैसला बिना बदलाव लागू होता है, तो लाखों शिक्षक असुरक्षा की स्थिति में आ जाएंगे। इससे शिक्षा व्यवस्था पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।

शिक्षक अगर लगातार परीक्षा की चिंता में रहेंगे, तो वे बच्चों को पूरे मन से पढ़ा नहीं पाएंगे।

कई अनुभवी शिक्षक नौकरी छोड़ने पर मजबूर हो सकते हैं।

नई भर्ती में भी असंतुलन पैदा होगा, क्योंकि पुराने शिक्षक और नए शिक्षक के बीच खाई बढ़ेगी।

संतुलन की ज़रूरत

किसी भी निर्णय का प्रभाव तभी सकारात्मक होता है जब उसमें सभी वर्गों का ध्यान रखा जाए। शिक्षा एक ऐसा क्षेत्र है, जहां जल्दबाज़ी में लिए गए फैसले का असर आने वाली पीढ़ियों पर पड़ता है। इसलिए जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर पुनर्विचार करे और सरकार भी शिक्षकों से बातचीत कर समाधान निकाले।

टीईटी को अनिवार्य करना शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में एक सही कदम हो सकता है, लेकिन इसे लागू करने का तरीका न्यायसंगत होना चाहिए। जो शिक्षक पहले से वर्षों से सेवा दे रहे हैं, उनके अनुभव को नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल होने वाली यह पुनर्विचार याचिका लाखों शिक्षकों की उम्मीदें अपने साथ लिए हुए है। अब देखना यह होगा कि अदालत इस पर क्या फैसला देती है और क्या शिक्षा व्यवस्था में ऐसा संतुलन लाया जा सकेगा, जिससे गुणवत्ता भी बनी रहे और अनुभवी शिक्षक भी सम्मान के साथ अपनी सेवा पूरी कर सकें।

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