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मोदी सरकार के 12 साल और गिरता रुपया: आखिर भारतीय मुद्रा क्यों हो रही कमजोर?

भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। सरकार लगातार विकास, निवेश और वैश्विक ताकत बनने की बातें करती है। लेकिन दूसरी तरफ एक ऐसा मुद्दा भी है जो आम आदमी की जेब से सीधे जुड़ा हुआ है और वो है भारतीय रुपये की लगातार गिरती कीमत। पिछले कुछ सालों में डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार कमजोर हुआ है और इसको लेकर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लगभग 12 साल के कार्यकाल में भारतीय रुपया करीब 62 प्रतिशत तक कमजोर हुआ है। वहीं पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के 10 साल के कार्यकाल में रुपये में लगभग 31 प्रतिशत की गिरावट देखी गई थी। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर तेजी से विकास का दावा करने वाले भारत में रुपया इतना कमजोर क्यों हो रहा है?

रुपये की कीमत गिरने का सीधा असर आम लोगों की जिंदगी पर पड़ता है। जब रुपया कमजोर होता है तो विदेशों से आने वाला सामान महंगा हो जाता है। भारत बड़ी मात्रा में कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। डॉलर मजबूत और रुपया कमजोर होने का मतलब है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं। इसका असर सिर्फ ईंधन तक सीमित नहीं रहता बल्कि ट्रांसपोर्ट, खाद्य पदार्थ और रोजमर्रा की चीजों तक पहुंच जाता है।

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि किसी देश की मुद्रा तब मजबूत होती है जब उसकी अर्थव्यवस्था स्थिर हो, निर्यात बढ़ रहा हो और विदेशी निवेश लगातार आ रहा हो। भारत की अर्थव्यवस्था जरूर बढ़ रही है, लेकिन कई ऐसे कारण हैं जिनकी वजह से रुपया दबाव में बना हुआ है।

सबसे बड़ा कारण है डॉलर की बढ़ती ताकत। अमेरिका की अर्थव्यवस्था और वहां की ब्याज दरें वैश्विक बाजार को प्रभावित करती हैं। जब अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरें बढ़ाता है तो विदेशी निवेशक भारत जैसे देशों से पैसा निकालकर अमेरिका की ओर ले जाते हैं। इससे भारतीय बाजार पर दबाव बढ़ता है और रुपया कमजोर होता है।

दूसरी बड़ी वजह है भारत का आयात ज्यादा और निर्यात कम होना। भारत विदेशों से तेल, इलेक्ट्रॉनिक सामान और कई जरूरी वस्तुएं खरीदता है। इसके लिए डॉलर में भुगतान करना पड़ता है। जब डॉलर की मांग बढ़ती है तो रुपये पर दबाव बढ़ता है। अगर निर्यात उतनी तेजी से नहीं बढ़ता जितनी तेजी से आयात बढ़ रहा हो तो मुद्रा कमजोर होने लगती है।

हालांकि सरकार का कहना है कि पूरी दुनिया आर्थिक चुनौतियों से गुजर रही है। कोरोना महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध और वैश्विक मंदी जैसी परिस्थितियों का असर भारत पर भी पड़ा है। सरकार यह भी दावा करती है कि भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से बेहतर प्रदर्शन कर रही है।

लेकिन आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि अगर भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है तो फिर रुपया इतना कमजोर क्यों हो रहा है? खास बात यह भी है कि एशिया के कई देशों की मुद्राएं इस दौरान मजबूत हुई हैं या उनमें स्थिरता बनी हुई है। ऐसे में तुलना होना स्वाभाविक है।

रुपये की कमजोरी का असर विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों पर भी पड़ रहा है। विदेश यात्रा महंगी हो रही है और विदेशों से सामान मंगाना भी आम लोगों के लिए कठिन होता जा रहा है। वहीं कंपनियों की लागत बढ़ने से नौकरियों और व्यापार पर भी असर पड़ सकता है।

कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सिर्फ सरकार को दोष देना पूरी तरह सही नहीं होगा क्योंकि मुद्रा बाजार कई वैश्विक कारणों से प्रभावित होता है। लेकिन यह भी सच है कि मजबूत आर्थिक नीतियां, निर्यात बढ़ाने की रणनीति और विदेशी निवेश को स्थिर बनाए रखना किसी भी देश की मुद्रा को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाते हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आने वाले समय में रुपया फिर मजबूत होगा? क्या भारत अपनी आर्थिक ताकत को मुद्रा में भी बदल पाएगा? सरकार के सामने चुनौती सिर्फ विकास के आंकड़े दिखाने की नहीं बल्कि आम लोगों की जेब और देश की आर्थिक साख को मजबूत बनाए रखने की भी है।

भारतीय रुपया सिर्फ एक मुद्रा नहीं बल्कि देश की आर्थिक स्थिति का आईना है। अगर रुपया मजबूत होगा तो इसका मतलब होगा कि दुनिया भारत की अर्थव्यवस्था पर भरोसा कर रही है। लेकिन अगर गिरावट लगातार जारी रहती है तो आने वाले समय में यह चिंता का बड़ा विषय बन सकता है।

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