Uttarakhand folk singer Basanti Bisht- बसंती बिष्टः उत्तराखंड की लोकसंगीत परंपरा को नया आयाम देने वाली गायिका
उत्तराखंड, जो अपनी समृद्ध संस्कृति, सुंदर परिदृश्य और आध्यात्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है, लोकसंगीत की एक जीवंत परंपरा का घर भी है। इस क्षेत्र के कई पारंपरिक संगीत रूपों में, जागर को विशेष स्थान प्राप्त है। यह एक अनुष्ठानिक भजन है, जिसका प्रयोग देवताओं और पूर्वजों को आह्वान करने के लिए किया जाता है। वर्षों तक, जागर गायन मुख्य रूप से पुरुषों द्वारा किया जाता रहा, लेकिन बसंती बिष्ट ने इस परंपरा को चुनौती दी और इस प्राचीन कला का प्रमुख स्वर बनीं। Uttarakhand folk singer Basanti Bisht
उत्तराखंड के लोकसंगीत की धड़कन Uttarakhand folk singer Basanti Bisht
जागर केवल एक गीत नहीं है, बल्कि उत्तराखंड की आध्यात्मिक संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका गायन विशेष रूप से धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान किया जाता है, जब देवताओं और पूर्वजों को जागृत करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए आमंत्रित किया जाता है। यह गीत विशेष रूप से कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्रों में प्रचलित है, साथ ही नेपाल के कुछ हिस्सों में भी इसकी गूंज सुनाई देती है। इसकी शक्तिशाली ध्वनि और भावपूर्ण बोल समुदायों को एकजुट करते हैं। हालांकि, इस परंपरा में महिलाओं की भागीदारी बेहद सीमित रही। लेकिन बसंती बिष्ट ने इस धारणा को तोड़ा और जागर गायन को एक नई ऊँचाई दी।
शुरुआती जीवन : गाँव से विजय तक Uttarakhand folk singer Basanti Bisht
बसंती बिष्ट का जन्म उत्तराखंड के चमोली जिले के खूबसूरत गाँव लुवानी में हुआ। उनका बचपन लोक परंपराओं के बीच बीता। उनकी माँ विभिन्न मेलों और उत्सवों में जागर गाया करती थीं, जिससे बसंती को संगीत से लगाव हुआ ।
बसंती न केवल संगीत में रुचि रखती थीं, बल्कि पढ़ाई में भी अव्वल थीं। पाँचवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा में जिला स्तर पर प्रथम स्थान प्राप्त करने के बाद, उन्हें आगे की शिक्षा के लिए
छात्रवृत्ति मिली। लेकिन उनका मन हमेशा लोकसंगीत की ओर आकर्षित रहा।
परिवर्तन का दौर और नई शुरुआत Uttarakhand folk singer Basanti Bisht
परपरागत अपेक्षाओं के अनुसार, मात्र 15 वर्ष की उम्र में उनकी शादी तोपखाना सैनिक रंजीत सिंह से कर दी गई और वे गृहस्थ जीवन में व्यस्त हो गईं। परिवार की ज़िम्मेदारियों के चलते उनका संगीत से नाता कुछ समय के लिए टूट गया। लेकिन 30 वर्ष की उम्र के बाद, जब वे अपने पति के साथ पंजाब गईं, तो उनका संगीत प्रेम फिर जाग उठा । उनके पति ने उनके संगीत के प्रति जुनून को पहचाना और उन्हें इसे औपचारिक रूप से सीखने के लिए प्रेरित किया ।
40 वर्ष की उम्र में, बसंती बिष्ट ने गढ़वाल सभा के परेड ग्राउंड में अपना पहला सार्वजनिक प्रदर्शन किया। उन्होंने माँ नंदा देवी का जागर गाया, जिसे सुनकर दर्शकों ने जोश और तालियों की गड़गड़ाहट से उनका स्वागत किया। यह उनकी संगीत यात्रा की शुरुआत थी। Uttarakhand folk singer Basanti Bisht
स्थानीय मंचों से राष्ट्रीय पहचान तक
प्रथम प्रस्तुति के बाद, बसंती बिष्ट ने विभिन्न सार्वजनिक आयोजनों, भजन संध्या और लोक महोत्सवों में गायन किया। 1996 में, उन्होंने आकाशवाणी नजीबाबाद में ‘ए’ ग्रेड कलाकार के रूप में स्थान प्राप्त किया। उनकी आत्मीय आवाज़ और दर्शकों से जुड़ने की अनूठी क्षमता ने उन्हें लोकप्रिय बना दिया। उनके प्रसिद्ध गीतों में गोरिया रे, धोखेदार दगड़िया, न्योली, प्यारी सुमना और फोन करना शामिल गीत आज भी उत्तराखंड के लोगों के दिलों में बसे हुए हैं। बसंती बिष्ट के प्रयासों और योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया। 2017 में, उन्हें मध्य प्रदेश सरकार द्वारा राष्ट्रीय मातोश्री अहिल्या देवी सम्मान से सम्मानित किया गया। उसी वर्ष, उन्हें लोक संगीत के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए पद्मश्री से नवाज़ा गया। Uttarakhand folk singer Basanti Bisht
संगीत के माध्यम से महिलाओं को सशक्त बनाना
बसंती बिष्ट केवल एक लोकगायिका नहीं, बल्कि महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत भी बनीं। जहाँ परंपरागत रूप से महिलाओं को लोकगायन के सार्वजनिक मंच से दूर रखा जाता था, उन्होंने इस मिथक को तोड़ा। उनकी सफलता ने कई अन्य महिलाओं को अपने कला – संस्कार को अपनाने और लोकसंस्कृति के संरक्षण में योगदान देने का अवसर प्रदान किया। महिलाओं के सशक्तिकरण के प्रति उनके प्रयासों को देखते हुए, उन्हें उत्तराखंड सरकार द्वारा तीलू रौतेली नारी शक्ति सम्मान और भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा फर्स्ट लेडी 2018 पुरस्कार से सम्मानित किया गया। Uttarakhand folk singer Basanti Bisht
एक अमर विरासत बसंती बिष्ट की यात्रा संकल्प, समर्पण और संघर्ष की अद्भुत मिसाल है। एक साधारण ग्रामीण बालिका से लेकर उत्तराखंड की प्रतिष्ठित लोकगायिका बनने तक का सफर प्रेरणादायक है। उन्होंने न केवल जागर को पुनर्जीवित किया बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्ग भी प्रशस्त किया। आज भी उनके गीत उत्तराखंड की वादियों में गूंजते हैं और लोगों के हृदय को छूते हैं। बसंती बिष्ट केवल एक लोकगायिका नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक राजदूत भी हैं। उनका योगदान आने वाले वर्षों तक लोकसंस्कृति को समृद्ध करता रहेगा और नए कलाकारों को अपनी पहचान बनाने के लिए प्रेरित करता रहेगा। Uttarakhand folk singer Basanti Bisht






