Nainital High Court – खनन में लगे वाहनों में GPS सिस्टम लगेगा, नैनीताल हाईकोर्ट अवैध खनन पर सख्त
नैनीताल – उत्तराखंड उच्च न्यायालय में बागेश्वर जिले की कांडा तहसील और आसपास के गांवों में हो रहे अवैध खड़िया खनन को लेकर सुनवाई जारी है। इस खनन के कारण ग्रामीण इलाकों में मकानों में दरारें पड़ने, खेतों को नुकसान होने और पानी की लाइनें टूटने जैसी गंभीर समस्याएं सामने आई हैं। इस मामले में अदालत ने खुद संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका के रूप में सुनवाई शुरू की थी। इसके साथ ही 165 खनन इकाइयों से जुड़ी अलग अलग याचिकाओं पर भी विचार किया जा रहा है। मुख्य न्यायाधीश जी नरेंद्र और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने सोमवार को मामले की सुनवाई की और मंगलवार को भी सुनवाई जारी रहने की बात कही। सोमवार की सुनवाई में हाईकोर्ट ने खनन कार्यों पर सख्ती दिखाते हुए साफ कहा कि उत्तराखंड में खड़िया खनन से जुड़े सभी वाहनों में जीपीएस सिस्टम लगाना अनिवार्य होगा। अदालत ने पहले दिए गए अपने आदेश को दोहराते हुए कहा कि खनन में लगे वाहनों में जीपीएस प्रणाली होनी चाहिए और इसे रामन्ना पोर्टल से जोड़ा जाना जरूरी है। इससे यह पता चल सकेगा कि खनिज से लदे वाहन कहां से कहां तक जा रहे हैं और कहीं नियमों की अनदेखी तो नहीं हो रही। अदालत के सामने बागेश्वर जिले के खनन अधिकारी की ओर से जो रिपोर्ट रखी गई, उसमें कई चौंकाने वाली बातें सामने आईं। रिपोर्ट में बताया गया कि खनिज ढोने वाले कुछ वाहनों ने 55 किलोमीटर की दूरी तय करने में 12 से 18 घंटे का समय दिखाया है, जबकि ऐसा होना संभव नहीं है। इससे साफ होता है कि खनिज परिवहन के रिकॉर्ड में गड़बड़ी की जा रही है। इसी आधार पर याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत से मांग की गई कि खनन से जुड़े नियमों को सख्ती से लागू किया जाए। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि एक सप्ताह के भीतर खनन से जुड़े सभी नियमों को पूरी तरह लागू किया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि राज्य सरकार अपने सूचना प्रौद्योगिकी विभाग की मदद से ऐसी व्यवस्था तैयार करे, जिससे पूरे उत्तराखंड में खनन नीति का सही तरीके से पालन हो सके। जीपीएस और डिजिटल निगरानी के जरिए खनिज परिवहन पर नजर रखी जाए, ताकि अवैध खनन और अनियमितताओं पर रोक लग सके। इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई थी, जब कांडा तहसील के ग्रामीणों ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर अपनी पीड़ा बताई थी। ग्रामीणों ने बताया था कि अवैध खड़िया खनन की वजह से उनके गांवों में हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। कई घरों में दरारें पड़ गई हैं, खेत खराब हो गए हैं और पानी की लाइनें टूटने से पीने के पानी की समस्या पैदा हो गई है। ग्रामीणों ने अपने पत्र में यह भी बताया था कि खनन के कारण हालात इतने खराब हो गए हैं कि जो लोग आर्थिक रूप से सक्षम थे, वे हल्द्वानी और दूसरे शहरों की ओर पलायन कर चुके हैं। गांवों में अब ज्यादातर गरीब और कमजोर लोग ही बचे हैं, जिनके पास कहीं और जाने का विकल्प नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि खड़िया खनन से जुड़े लोगों की वजह से उनकी रोजी रोटी भी खतरे में पड़ गई है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने इस समस्या को लेकर कई बार प्रशासन और संबंधित अधिकारियों को शिकायतें दीं, लेकिन उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया गया। इसी निराशा के बीच उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसके बाद यह मामला जनहित याचिका के रूप में सामने आया। अब हाईकोर्ट के सख्त रुख से ग्रामीणों को उम्मीद जगी है कि अवैध खनन पर लगाम लगेगी और उनकी समस्याओं का समाधान होगा। अदालत की सख्ती यह संकेत दे रही है कि खनन के नाम पर नियमों की अनदेखी अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। आने वाली सुनवाई में इस मामले पर और अहम फैसले होने की संभावना है, जिनसे बागेश्वर के प्रभावित गांवों को राहत मिल सकती है।






