मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के इलाके में मंडराया बुलडोजर का साया, बेघर होने की आशंका से सहमे सैकड़ों परिवार
दिल्ली के शालीमार बाग क्षेत्र स्थित शालीमार गांव में इन दिनों चिंता, अनिश्चितता और भावनात्मक तनाव का माहौल बना हुआ है। वर्षों से यहां रह रहे सैकड़ों परिवारों के सामने अब अपने घर और दुकानें छोड़ने की नौबत आ गई है। प्रशासन द्वारा अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की तैयारी के बीच इलाके के लोग अपना सामान समेटने और नई जगहों की तलाश में जुट गए हैं। कई परिवार ऐसे हैं जो दशकों से इसी इलाके में रह रहे थे और अब अचानक अपने आशियाने से दूर होने की स्थिति का सामना कर रहे हैं।

आजादपुर सब्जी मंडी से मैक्स हॉस्पिटल की ओर जाने वाली सड़क के चौड़ीकरण की योजना के तहत प्रशासन ने सड़क किनारे स्थित कई मकानों और दुकानों को अनाधिकृत कब्जे की श्रेणी में रखा है। प्रशासन का कहना है कि सड़क विस्तार और यातायात व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए यह कार्रवाई आवश्यक है। वहीं प्रभावित परिवारों का दावा है कि वे पिछले 40 से 50 वर्षों से इस क्षेत्र में रह रहे हैं और उनके लिए यह केवल मकान नहीं बल्कि उनकी पूरी जिंदगी की कमाई और यादों का केंद्र है।
प्रभावित लोगों ने इस कार्रवाई को रोकने के लिए न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया। पहले दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की गई, जहां से उन्हें राहत नहीं मिली। अदालत ने मकान खाली करने के लिए निर्धारित समय सीमा प्रदान की थी। इसके बाद स्थानीय निवासियों ने अपनी अंतिम उम्मीद के रूप में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, लेकिन वहां भी उनकी याचिका खारिज हो गई। सुप्रीम कोर्ट से राहत न मिलने के बाद अब लोगों के सामने सीमित विकल्प ही बचे हैं।
इलाके में करीब 157 ऐसी संपत्तियां बताई जा रही हैं जिन्हें प्रशासन ने अतिक्रमण की श्रेणी में रखा है। इन संपत्तियों में मकान, दुकानें और छोटे व्यवसायिक प्रतिष्ठान शामिल हैं। इन स्थानों पर रहने वाले लोगों का कहना है कि उन्होंने वर्षों की मेहनत से अपने घर बनाए थे और अब उन्हें अचानक खाली करने का आदेश मिलने से उनका भविष्य अनिश्चित हो गया है।

की गलियों में इन दिनों एक अलग ही दृश्य देखने को मिल रहा है। कहीं लोग घरेलू सामान पैक कर रहे हैं तो कहीं दुकानें खाली की जा रही हैं। कई परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई और रोजगार को लेकर चिंतित हैं। बुजुर्गों के लिए यह स्थिति और भी कठिन है क्योंकि उन्होंने अपना अधिकांश जीवन इसी इलाके में बिताया है। अनेक लोगों की आंखों में अपने घरों को छोड़ने का दर्द साफ दिखाई देता है।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि विकास कार्यों का वे विरोध नहीं कर रहे हैं, लेकिन उनका मानना है कि पुनर्वास और वैकल्पिक व्यवस्था के बिना इस तरह की कार्रवाई से अनेक परिवारों पर गंभीर सामाजिक और आर्थिक प्रभाव पड़ सकता है। उनका आग्रह है कि प्रशासन प्रभावित लोगों की समस्याओं को समझे और उन्हें उचित सहायता उपलब्ध कराए।
दूसरी ओर प्रशासन का तर्क है कि सड़क चौड़ीकरण परियोजना से क्षेत्र में यातायात व्यवस्था बेहतर होगी, जाम की समस्या कम होगी और आम लोगों को सुविधाएं मिलेंगी। अधिकारियों का कहना है कि सार्वजनिक हित में किए जाने वाले विकास कार्यों को समय पर पूरा करना आवश्यक है।

फिलहाल शालीमार गांव में लोगों के बीच बेचैनी और असमंजस का माहौल बना हुआ है। जिन घरों में कभी खुशियों और पारिवारिक यादों की गूंज सुनाई देती थी, वहां अब सामान बांधने और भविष्य की चिंता की चर्चा हो रही है। वर्षों पुराने आशियानों को छोड़ने की मजबूरी ने कई परिवारों को भावुक कर दिया है।
आने वाले दिनों में प्रशासन की कार्रवाई और प्रभावित परिवारों की स्थिति पर पूरे क्षेत्र की नजर बनी रहेगी। यह मामला केवल सड़क चौड़ीकरण का नहीं, बल्कि उन सैकड़ों परिवारों की जिंदगी से भी जुड़ा है जिनके लिए उनका घर सिर्फ एक भवन नहीं, बल्कि उनकी पहचान और जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।





