डिजिटल अरेस्ट धोखाधड़ी: जानें कैसे बचें और 1930 पर शिकायत करें।
नई दिल्ली: कल्पना कीजिए, आपके मोबाइल पर अचानक एक वीडियो कॉल आता है। सामने पुलिस की वर्दी पहने एक व्यक्ति बैठा है। वह खुद को दिल्ली पुलिस, सीबीआई या किसी केंद्रीय जांच एजेंसी का अधिकारी बताता है। फिर दावा करता है कि आपके आधार कार्ड, बैंक खाते या मोबाइल नंबर का इस्तेमाल किसी आपराधिक गतिविधि में हुआ है। आपको गिरफ्तार करने की धमकी दी जाती है और मामला खत्म करने के लिए पैसे जमा करने को कहा जाता है। घबराहट में कई लोग अपनी जमा-पूंजी तक गंवा बैठते हैं।
साइबर ठगी के इस तरीके को डिजिटल अरेस्ट स्कैम कहा जाता है। इसमें अपराधी सरकारी अधिकारी होने का दिखावा करके लोगों को डराते हैं, वीडियो कॉल पर निगरानी में रखते हैं और पैसों की मांग करते हैं। भारत सरकार के साइबर अपराध पोर्टल ने भी इस तरह की धोखाधड़ी को लेकर चेतावनी जारी की है।
डिजिटल अरेस्ट क्या है?
डिजिटल अरेस्ट कोई वास्तविक कानूनी गिरफ्तारी प्रक्रिया नहीं है। यह साइबर अपराधियों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला एक धोखाधड़ी का तरीका है, जिसमें व्यक्ति को फोन या वीडियो कॉल के जरिए यह विश्वास दिलाया जाता है कि वह किसी गंभीर मामले में फंस चुका है।

ठग खुद को पुलिस, सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय, नारकोटिक्स विभाग या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बता सकते हैं। वे फर्जी पहचान पत्र, कथित गिरफ्तारी वारंट और सरकारी कार्यालय जैसा दिखाई देने वाला बैकग्राउंड दिखाकर अपनी बात को विश्वसनीय बनाने की कोशिश करते हैं।
इसके बाद पीड़ित से कहा जाता है कि वह कॉल न काटे, किसी से संपर्क न करे और जांच पूरी होने तक कैमरे के सामने रहे। कई मामलों में कथित जमानत, खाते के सत्यापन या सुरक्षा जमा के नाम पर पैसे मांगे जाते हैं। असल उद्देश्य व्यक्ति को मानसिक दबाव में लाकर उसकी रकम ठगना होता है।
कैसे पहचानें कि फोन करने वाला ठग हो सकता है?
डिजिटल अरेस्ट स्कैम में अपराधी डर और जल्दबाजी का फायदा उठाते हैं। इसलिए कुछ संकेतों को पहचानना बेहद जरूरी है।
गिरफ्तारी की धमकी: फोन पर कहा जाए कि आप तुरंत गिरफ्तार होने वाले हैं और मामला केवल पैसे देकर सुलझ सकता है।

वीडियो कॉल पर निगरानी: आपको घंटों कैमरे के सामने बैठे रहने या परिवार से बात न करने का निर्देश दिया जाए।
पैसे ट्रांसफर करने का दबाव: कथित जांच, खाते की सफाई, सत्यापन या जमानत के नाम पर रकम मांगी जाए।
गोपनीयता बनाए रखने की शर्त: आपको परिवार, बैंक या स्थानीय पुलिस से बात करने से रोका जाए।
फर्जी दस्तावेज: अधिकारी पहचान पत्र या वारंट दिखाए, लेकिन उसकी सत्यता की स्वतंत्र रूप से पुष्टि न हो सके।

याद रखें, केवल वर्दी, सरकारी लोगो या वीडियो कॉल पर दिखाई देने वाला कार्यालय किसी व्यक्ति की पहचान का प्रमाण नहीं है। ठग तकनीक का इस्तेमाल करके भरोसा जीतने की कोशिश कर सकते हैं।
क्या पुलिस वीडियो कॉल पर गिरफ्तार कर सकती है?
किसी अनजान कॉलर का वीडियो पर खुद को पुलिस अधिकारी बताना और डिजिटल अरेस्ट की घोषणा करना वास्तविक गिरफ्तारी का कानूनी विकल्प नहीं है। प्रधानमंत्री कार्यालय और गृह मंत्रालय से संबंधित सरकारी जागरूकता संदेशों में भी स्पष्ट किया गया है कि सरकारी एजेंसियां फोन या वीडियो कॉल के जरिए इस तरह जांच करके पैसे नहीं मांगतीं।

यदि कोई व्यक्ति खुद को अधिकारी बताकर संपर्क करता है, तो कॉल पर दिए गए नंबर या लिंक पर भरोसा करने के बजाय संबंधित पुलिस विभाग की आधिकारिक वेबसाइट से संपर्क विवरण लेकर स्वतंत्र रूप से पुष्टि करें। किसी संदिग्ध कॉलर को बैंक खाते की जानकारी, पासवर्ड, ओटीपी या पहचान संबंधी संवेदनशील विवरण न दें।
ऑनलाइन फ्रॉड से कैसे बचें? अपनाएं ये जरूरी सावधानियां
डिजिटल अरेस्ट और अन्य ऑनलाइन धोखाधड़ी से बचने के लिए कुछ आसान आदतें मददगार हो सकती हैं।
- घबराकर फैसला न लें: गिरफ्तारी या कानूनी कार्रवाई की धमकी सुनते ही पैसे ट्रांसफर न करें। कॉल काटकर तथ्यों की जांच करें।
- निजी जानकारी साझा न करें: बैंक विवरण, ओटीपी, यूपीआई पिन, पासवर्ड और अन्य गोपनीय जानकारी किसी अनजान व्यक्ति को न बताएं।
- परिवार को जानकारी दें: ठग अक्सर पीड़ित को अकेला रखने की कोशिश करते हैं। किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करने पर धोखाधड़ी का पता लगाने में मदद मिल सकती है।
- संदिग्ध लिंक से बचें: व्हाट्सऐप या एसएमएस पर आए अज्ञात लिंक, फाइल या ऐप को बिना जांचे न खोलें और न ही कोई रिमोट एक्सेस ऐप इंस्टॉल करें।
- सबूत सुरक्षित रखें: कॉल करने वाले का नंबर, संदेश, भुगतान विवरण और उपलब्ध स्क्रीनशॉट सुरक्षित रखें। इनसे शिकायत और जांच में मदद मिल सकती है।

साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 पर कब करें कॉल?
अगर आपके साथ डिजिटल अरेस्ट या किसी अन्य तरह की ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी हुई है, तो तुरंत 1930 पर संपर्क करें। यह भारत की राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन है। जितनी जल्दी शिकायत की जाएगी, रकम के लेन-देन को रोकने या आगे की हानि कम करने की कोशिश करने में उतनी ही मदद मिल सकती है। हालांकि, पैसा वापस मिलने की गारंटी नहीं होती।
शिकायत दर्ज करने के लिए ये कदम अपनाएं
राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर कॉल करें।
आधिकारिक वेबसाइट cybercrime.gov.in पर जाकर साइबर अपराध की शिकायत दर्ज करें।

बैंक को तुरंत सूचित करके संदिग्ध लेन-देन की जानकारी दें और खाते या भुगतान माध्यम को सुरक्षित करने के लिए आवश्यक कदम पूछें।
लेन-देन की रसीद, संदेश, कॉल विवरण और शिकायत संख्या संभालकर रखें।
जरूरत पड़ने पर नजदीकी पुलिस स्टेशन या साइबर क्राइम सेल से संपर्क करें।
यदि ठग ने पैसे नहीं लिए हैं, लेकिन धमकी देकर परेशान कर रहा है, तब भी उसकी सूचना संबंधित पुलिस या साइबर अपराध पोर्टल पर दी जा सकती है।
डिजिटल सुरक्षा का मंत्र
डिजिटल अरेस्ट स्कैम का सबसे बड़ा हथियार लोगों का डर है। अपराधी चाहते हैं कि पीड़ित बिना सवाल किए उनकी बात माने और जल्द से जल्द पैसे भेज दे। इसलिए किसी भी कॉल पर दबाव महसूस होने पर कुछ पल रुकना, जानकारी की पुष्टि करना और सही जगह शिकायत करना जरूरी है।
याद रखें, कोई भी असली अधिकारी होने का दावा करने वाला व्यक्ति आपसे केवल फोन पर डराकर पैसे जमा कराने का अधिकार नहीं पा जाता। अपनी निजी जानकारी सुरक्षित रखें, परिवार के लोगों—खासकर बुजुर्गों—को इस तरह की ठगी के बारे में जागरूक करें और किसी भी संदिग्ध घटना को नजरअंदाज न करें।
एक छोटी-सी सावधानी आपकी वर्षों की बचत बचा सकती है। यदि डिजिटल अरेस्ट के नाम पर धमकी मिले, तो न पैसे भेजें, न गोपनीय जानकारी साझा करें और जरूरत पड़ने पर तुरंत 1930 पर शिकायत करें





