कुमाऊनी फीचर फिल्म ‘मंगल’ मे पिथौरागढ़ के जनार्दन उप्रेती की अहम भूमिका
पिथौरागढ़ की माटी, लोक-संस्कृति, परंपराओं और अनछुए प्राकृतिक सौंदर्य को बड़े पर्दे पर जीवंत करती कुमाऊँनी फीचर फिल्म ‘मंगल’ इन दिनों दर्शकों के बीच अपनी अलग पहचान बना रही है। प्रभावशाली कहानी, स्थानीय परिवेश और उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत के सजीव चित्रण के साथ फिल्म में नजर आने वाले स्थानीय कलाकारों के सशक्त अभिनय की भी जमकर सराहना हो रही है।
फिल्म में विशेष रूप से वरिष्ठ सांस्कृतिक हस्ताक्षर जनार्दन उप्रेती अपने सहज, प्रभावशाली और दमदार अभिनय से दर्शकों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। पिथौरागढ़ के सांस्कृतिक जगत में लंबे समय से सक्रिय जनार्दन उप्रेती लोक-संस्कृति, लेखन, रंगमंच और विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े रहे हैं। फिल्म ‘मंगल’ में उन्होंने गाँव के एक बुजुर्ग व्यक्ति की भूमिका निभाई है, जिसे दर्शकों द्वारा खूब पसंद किया जा रहा है।
उनके अभिनय की खासियत यह है कि पर्दे पर उनका किरदार किसी बनावटी चरित्र की तरह नहीं, बल्कि पहाड़ के जीवन और समाज से निकला हुआ एक अपना-सा व्यक्तित्व महसूस होता है। संवादों की सहजता, भाव-भंगिमा और पहाड़ी परिवेश के अनुरूप उनका अभिनय फिल्म के कथानक को स्थानीय रंग और अधिक गहराई प्रदान करता है।

स्थानीय कलाकारों ने बिखेरा प्रतिभा का रंग ‘मंगल’ की एक बड़ी खासियत यह भी है कि फिल्म में पिथौरागढ़ और आसपास के क्षेत्रों के कई स्थानीय कलाकारों को महत्वपूर्ण भूमिकाओं में शामिल किया गया है। इन कलाकारों ने अपने स्वाभाविक और प्रभावशाली अभिनय से फिल्म के किरदारों में जीवंतता भर दी है।
स्थानीय कलाकारों की मौजूदगी ने फिल्म के दृश्यों को अधिक वास्तविक और आत्मीय बनाया है। यही वजह है कि फिल्म के कई दृश्य दर्शकों को अपने आसपास के जीवन, रिश्तों और पहाड़ की सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े हुए महसूस होते हैं।
पर्दे पर पहली बार दिखा पिथौरागढ़ का अनछुआ सौंदर्य ‘मंगल’ केवल एक कहानी नहीं, बल्कि पिथौरागढ़ की माटी, संस्कृति और प्राकृतिक विरासत का सिनेमाई दस्तावेज भी बनकर सामने आती है। फिल्म की शूटिंग पिथौरागढ़ के अलावा दिल्ली और गाज़ियाबाद में भी की गई है।
खास बात यह है कि फिल्म में पिथौरागढ़ के कई ऐसे खूबसूरत और अपेक्षाकृत अनछुए प्राकृतिक स्थलों को कैमरे में कैद किया गया है, जिन्हें बड़े पर्दे पर पहली बार इस तरह देखने का अवसर दर्शकों को मिल रहा है।
पहाड़ की घाटियाँ, गाँवों का परिवेश, प्राकृतिक सौंदर्य और स्थानीय जीवन के दृश्य फिल्म को एक विशिष्ट दृश्यात्मक पहचान देते हैं। इन दृश्यों के माध्यम से दर्शकों को उत्तराखंड के उस रूप से रूबरू कराया गया है, जो अक्सर मुख्यधारा के सिनेमा में अनदेखा रह जाता है।

“मंगल पिथौरागढ़ की मिट्टी से जुड़ी फिल्म है” — जनार्दन उप्रेती जनार्दन उप्रेती के अनुसार, “मंगल पिथौरागढ़ की मिट्टी से जुड़ी हुई फिल्म है। इसमें हमारे अपने गाँव, हमारी संस्कृति और वे स्थान दिखाए गए हैं, जिन्हें आज तक किसी ने इस रूप में नहीं दिखाया था। यही वजह है कि दर्शक फिल्म को अपना महसूस कर रहे हैं।”
उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में उत्तराखंड की लोक-संस्कृति, भाषा, परंपराओं और विरासत को केंद्र में रखकर और अधिक फिल्में बनेंगी, जो प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को देश ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाने का काम करेंगी।
क्षेत्रीय सिनेमा के लिए महत्वपूर्ण पहल कुमाऊँनी भाषा की आत्मीयता, स्थानीय कलाकारों की भागीदारी और उत्तराखंड की संस्कृति के प्रभावशाली चित्रण के कारण ‘मंगल’ क्षेत्रीय सिनेमा के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में उभर रही है।
फिल्म ने यह संदेश भी दिया है कि स्थानीय कहानियाँ, स्थानीय भाषा और स्थानीय कलाकार बड़े पर्दे पर अपनी मजबूत पहचान बना सकते हैं। वहीं, जनार्दन उप्रेती जैसे अनुभवी सांस्कृतिक व्यक्तित्व की मौजूदगी ने फिल्म को गरिमा, विश्वसनीयता और सांस्कृतिक गहराई प्रदान की है।
पिथौरागढ़ की मिट्टी से निकली कहानी, कुमाऊँनी भाषा की मिठास और स्थानीय कलाकारों की प्रतिभा—‘मंगल’ उत्तराखंड की उस आवाज़ को बड़े पर्दे तक पहुँचा रही है, जो अपनी संस्कृति, परंपरा और पहचान को देश-दुनिया तक पहुँचाने की क्षमता रखती है।





