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जयशंकर का संदेश: ‘डी-रिस्किंग और डायवर्सिफिकेशन’ पर जोर, आपूर्ति श्रृंखला मजबूत करने की जरूरत

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बदलते वैश्विक माहौल के बीच देशों को आर्थिक और रणनीतिक जोखिम कम करने के लिए अपनी साझेदारियों और आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाने पर जोर दिया है। न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान आयोजित पार्टनर्स फॉर मल्टीलेटेरलिज्म, इंटरनेशनल लॉ, पीस एंड प्रॉस्पेरिटी शिखर सम्मेलन में उन्होंने कहा कि जहां किसी एक क्षेत्र, देश या आपूर्ति मार्ग पर अत्यधिक निर्भरता से जोखिम पैदा होता है, वहां डी-रिस्किंग और डायवर्सिफिकेशन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

डी-रिस्किंग क्या है ?

डी-रिस्किंग का अर्थ किसी एक देश, बाजार, तकनीक या आपूर्ति स्रोत पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता को कम करना है। इसका उद्देश्य संबंधों को पूरी तरह खत्म करना नहीं, बल्कि संभावित संकट की स्थिति में विकल्प उपलब्ध रखना है।

जयशंकर ने वैश्विक व्यवस्था में बढ़ती प्रतिस्पर्धा, भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में आने वाली बाधाओं का उल्लेख करते हुए इस तरह की रणनीति की जरूरत बताई।

क्यों महत्वपूर्ण डायवर्सिफिकेशन ?

डायवर्सिफिकेशन यानी व्यापार, ऊर्जा, तकनीक और जरूरी वस्तुओं के लिए अलग-अलग देशों और स्रोतों के साथ संबंध बढ़ाना। इससे किसी एक क्षेत्र में संकट आने पर पूरी आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित होने का जोखिम कम किया जा सकता है।

जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने संबोधन के दौरान खाद्य, ईंधन, उर्वरक और वित्त यानी ‘4F’ सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि वैश्विक व्यवधानों का असर विकासशील देशों पर विशेष रूप से पड़ता है।

भारत के हित मैं इसका क्या मतलब ?

भारत के संदर्भ में यह दृष्टिकोण व्यापारिक साझेदारियों, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी सहयोग और आपूर्ति श्रृंखलाओं को व्यापक बनाने से जुड़ा है। जयशंकर ने पहले भी कई व्यापार समझौतों और अलग-अलग साझेदारियों को जोखिम कम करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा बताया है।

उनके बयान ऐसे समय आए हैं जब वैश्विक व्यापार और आपूर्ति श्रृंखलाएं भू-राजनीतिक तनाव, संघर्ष और आर्थिक प्रतिस्पर्धा से प्रभावित हो रही हैं। ऐसे माहौल में देशों के लिए स्थिर आपूर्ति और कई विकल्प बनाए रखना एक महत्वपूर्ण नीतिगत मुद्दा बन गया है।

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