#Home #Spiritual

भगवान शिव का जन्म कैसे हुआ? जानिए उस अनंत ज्योति स्तंभ की कथा, जिसका आदि-अंत कोई नहीं जान पाया

भगवान शिव का जन्म कैसे हुआ?

हिंदू धर्म में भगवान शिव को सृष्टि की उन दिव्य शक्तियों में माना जाता है, जिन्हें समय की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। उन्हें महादेव, भोलेनाथ, महाकाल और स्वयंभू जैसे अनेक नामों से पुकारा जाता है। लेकिन भक्तों के मन में अक्सर एक सवाल उठता है—जब हर जीव और हर वस्तु की उत्पत्ति होती है, तो भगवान शिव का जन्म कैसे हुआ?

क्या महादेव का कोई आरंभ है?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव अनादि और अनंत हैं। यानी उनका न कोई निश्चित आरंभ है और न ही अंत। वे केवल एक साकार देवता के रूप में ही नहीं, बल्कि परम सत्य और निराकार चेतना के प्रतीक के रूप में भी पूजे जाते हैं। शिवपुराण में वर्णित एक प्रसिद्ध कथा इसी रहस्य को समझाने का प्रयास करती है। इस कथा में ब्रह्मा और विष्णु के सामने एक ऐसी दिव्य ज्योति प्रकट होती है, जिसकी सीमा तक पहुंचना उनके लिए भी संभव नहीं हो पाता।

जब ब्रह्मा और विष्णु के बीच हुआ विवाद

शिवपुराण की प्रचलित कथा के अनुसार, एक बार भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच इस बात को लेकर विवाद हुआ कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। दोनों अपनी-अपनी महत्ता को लेकर तर्क कर रहे थे। तभी अचानक उनके सामने एक विशाल और अद्भुत प्रकाश पुंज प्रकट हुआ।

यह कोई साधारण रोशनी नहीं थी। वह एक विराट ज्योति स्तंभ था, जो आकाश से ऊपर और धरती के नीचे तक फैला दिखाई देता था। उसका न तो ऊपरी सिरा नजर आ रहा था और न ही निचला छोर। उसकी विशालता देखकर दोनों देवता आश्चर्यचकित रह गए।

विवाद का समाधान खोजने के लिए दोनों ने उस स्तंभ की सीमा का पता लगाने का निर्णय लिया। भगवान विष्णु उसके निचले छोर की खोज में नीचे की ओर चले गए, जबकि ब्रह्मा उसके ऊपरी छोर को खोजने के लिए ऊपर की दिशा में बढ़े।

न मिला आरंभ, न दिखाई दिया अंत

कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने उस दिव्य स्तंभ का निचला सिरा खोजने के लिए लंबी यात्रा की, लेकिन वे उसकी सीमा तक नहीं पहुंच सके। दूसरी ओर, ब्रह्मा भी ऊपर की ओर जाते रहे, मगर उन्हें उस ज्योति का अंतिम छोर नहीं मिला।

अंततः दोनों को एहसास हुआ कि यह कोई सामान्य शक्ति नहीं है, जिसे अपनी सीमित समझ और सामर्थ्य से मापा जा सके। उस अनंत प्रकाश के सामने उनकी खोज अधूरी रह गई।

इस कथा के कुछ प्रचलित संस्करणों में ब्रह्मा और विष्णु के लौटने के बाद ज्योति स्तंभ से भगवान शिव के प्रकट होने का वर्णन मिलता है। इस दिव्य रूप को शिव के निराकार और असीम स्वरूप का प्रतीक माना जाता है। इसी प्रसंग को शिवलिंग की महिमा और भगवान शिव के अनादि स्वरूप से भी जोड़ा जाता है।

क्यों कहा जाता है भगवान शिव को स्वयंभू और अनंत?

स्वयंभू’ का अर्थ है वह सत्ता, जिसकी उत्पत्ति किसी अन्य से न हुई हो। वहीं ‘अनादि’ का अर्थ है जिसका कोई आरंभ न हो और ‘अनंत’ का अर्थ है जिसकी कोई सीमा या समाप्ति न हो।

धार्मिक दृष्टि से भगवान शिव को इन नामों से पुकारने के पीछे यही भाव है कि परम सत्ता को किसी एक समय, स्थान या आकार में सीमित नहीं किया जा सकता। ज्योति स्तंभ की कथा भी इसी विचार को सामने रखती है। ब्रह्मा और विष्णु जैसे महान देवता भी जब उसकी सीमा नहीं खोज पाए, तो यह स्पष्ट हुआ कि अहंकार या अपनी श्रेष्ठता का दावा परम सत्य को समझने के लिए पर्याप्त नहीं है।

इस प्रसंग में शिव केवल एक देवता के रूप में नहीं, बल्कि उस अनंत शक्ति के प्रतीक के रूप में सामने आते हैं, जो सृष्टि की सीमाओं से परे मानी जाती है।

महाकाल: समय से परे महादेव का स्वरूप

भगवान शिव का एक प्रसिद्ध नाम महाकाल भी है। धार्मिक मान्यताओं में उन्हें काल यानी समय का स्वामी माना जाता है। समय के साथ संसार में जन्म, परिवर्तन और विनाश होता है, लेकिन शिव का महाकाल स्वरूप इस विचार का प्रतीक है कि परम सत्ता को सामान्य समय-सीमा में नहीं बांधा जा सकता।

इसी कारण शिवभक्त महादेव को सृष्टि के परिवर्तन और जीवन की नश्वरता के बीच स्थिर आध्यात्मिक सत्य के रूप में देखते हैं। शिव की आराधना केवल वरदान पाने की कामना तक सीमित नहीं है; यह वैराग्य, संयम, विनम्रता और आत्मचिंतन का संदेश भी देती है।

शिव की कथा से क्या सीख मिलती है?

ब्रह्मा, विष्णु और अनंत ज्योति स्तंभ की कथा का एक महत्वपूर्ण संदेश अहंकार का त्याग है। जब दो महान देवता भी उस दिव्य प्रकाश की सीमा नहीं खोज पाए, तो मनुष्य के लिए अपनी सीमित समझ पर गर्व करना उचित नहीं रह जाता।

यह कथा हमें याद दिलाती है कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए विनम्रता जरूरी है। जीवन में पद, शक्ति और उपलब्धियां महत्वपूर्ण हो सकती हैं, लेकिन वे किसी को सर्वज्ञ नहीं बना देतीं। सत्य की खोज में जिज्ञासा के साथ-साथ स्वीकार करने की क्षमता भी होनी चाहिए।

भगवान शिव का अनादि और अनंत स्वरूप इसी आध्यात्मिक विचार को सामने रखता है। शिवपुराण की यह कथा भक्तों के लिए केवल एक धार्मिक प्रसंग नहीं, बल्कि विनम्रता और आत्मबोध का संदेश भी है।

हर हर महादेव!

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *