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क्या हुआ मच गया बवाल बद्रीनाथ सांस्कृतिक महोत्सव  पर ऐसा क्यू हुआ ?

चमोली: उत्तराखंड के प्रसिद्ध बद्रीनाथ धाम में आयोजित देवभूमि सांस्कृतिक महोत्सव-2026 अब विवादों में घिर गया है। 19 और 20 सितंबर को बद्रीनाथ के टूरिस्ट अराइवल प्लाजा में हुए इस दो दिवसीय कार्यक्रम का उद्देश्य उत्तराखंड की लोक संस्कृति, स्थानीय उत्पादों, हस्तशिल्प और सीमांत गांवों की परंपराओं को मंच देना बताया गया था। यह आयोजन भारतीय सेना के ऑपरेशन सद्भावना के तहत चमोली जिला प्रशासन और उत्तराखंड पर्यटन विभाग के सहयोग से आयोजित हुआ था।

महोत्सव के दौरान संगीत और नृत्य प्रस्तुतियों के वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद धार्मिक मर्यादा और कार्यक्रम के स्वरूप को लेकर सवाल उठे। इसके बाद मामला केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम की आलोचना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि चमोली प्रशासन और सेना के बीच अनुमति तथा आयोजन की जिम्मेदारी को लेकर भी मतभेद सामने आए हैं।

दो दिवसीय महोत्सव  बद्रीनाथ में आयोजित हुआ था

देवभूमि सांस्कृतिक महोत्सव 19 और 20 सितंबर को आयोजित किया गया था। कार्यक्रम को उत्तराखंड की संस्कृति और सीमांत क्षेत्रों की परंपराओं को सामने लाने की पहल के तौर पर प्रस्तुत किया गया। इसमें स्थानीय कलाकारों, महिला स्वयं सहायता समूहों और अन्य प्रतिभागियों की भागीदारी भी रही।

ऑल इंडिया रेडियो की रिपोर्ट के अनुसार, महोत्सव की थीम ‘संस्कृति हमारी विरासत, हमारा भविष्य’ रखी गई थी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी 20 सितंबर को कार्यक्रम में शामिल हुए थे।

वायरल वीडियो के बाद बढ़ा विवाद

विवाद उस समय तेज हुआ जब कार्यक्रम की कुछ प्रस्तुतियों के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे। इनमें तेज आवाज वाले संगीत और डांस की प्रस्तुतियां दिखाई दीं। रिपोर्टों के मुताबिक उत्तराखंड की गायिका प्रियंका मेहर की प्रस्तुति भी कार्यक्रम का हिस्सा थी।

इसके बाद कुछ धार्मिक संगठनों, पुरोहितों और राजनीतिक नेताओं ने बद्रीनाथ जैसे धार्मिक स्थल के आसपास इस तरह के कार्यक्रम के आयोजन के स्वरूप पर सवाल उठाए।

विरोध करने वालों की मुख्य चिंता यह रही कि बद्रीनाथ धाम की धार्मिक और आध्यात्मिक प्रकृति को ध्यान में रखते हुए वहां होने वाले कार्यक्रमों में ध्वनि और प्रस्तुतियों की मर्यादा का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए।

सेना से मांगा स्पष्टीकरण चमोली प्रशासन द्वारा

विवाद बढ़ने के बाद चमोली जिला प्रशासन की ओर से भारतीय सेना की गढ़वाल स्काउट्स बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर से स्पष्टीकरण मांगा गया। जिलाधिकारी की ओर से भेजे गए पत्र में पूछा गया कि क्या बद्रीनाथ धाम में इस कार्यक्रम के आयोजन के लिए आवश्यक अनुमति ली गई थी और तेज आवाज वाले साउंड सिस्टम के इस्तेमाल की अनुमति किस स्तर से मिली थी।

प्रशासन की ओर से यह भी कहा गया कि बद्रीनाथ एक पवित्र धार्मिक स्थल है और तेज आवाज वाले साउंड सिस्टम से नियमित पूजा और धार्मिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता है। इसी के साथ भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न होने को लेकर भी पत्र में बात रखी गई।

अलग तस्वीर से सामने आई दस्तावेजों की बात

मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बाद में सामने आए प्रशासनिक दस्तावेजों में महोत्सव की तैयारियों में जिला प्रशासन की भागीदारी के संकेत मिले हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, जिलाधिकारी कार्यालय की ओर से जारी आदेशों में अधिकारियों को महोत्सव की व्यवस्थाओं के लिए बैठक में शामिल होने और आवश्यक इंतजाम सुनिश्चित करने को कहा गया था। एक अन्य पत्र में सेना के गढ़वाल स्काउट्स की ओर से कार्यक्रम से संबंधित पत्राचार का भी उल्लेख था।

यानी आयोजन के बाद प्रशासन की ओर से सेना से अनुमति को लेकर स्पष्टीकरण मांगने के बावजूद उपलब्ध दस्तावेजों में पहले से हुए समन्वय की तस्वीर सामने आती है। इसी वजह से अब यह सवाल भी चर्चा में है कि आयोजन की जिम्मेदारी और अनुमति की प्रक्रिया वास्तव में किस स्तर पर तय हुई थी।

क्या है मतभेद प्रशासन और सेना के बीच?

सेना से जुड़े एक अधिकारी ने दावा किया कि कार्यक्रम जिला प्रशासन के समन्वय से आयोजित हुआ था और आवश्यक अनुमतियां ली गई थीं। वहीं जिला प्रशासन की ओर से बाद में कहा गया कि सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन में उसकी भूमिका नहीं थी और सेना को नोटिस भेजकर स्पष्टीकरण मांगा गया।

इस तरह विवाद का एक हिस्सा धार्मिक मर्यादा से जुड़ा है, जबकि दूसरा हिस्सा प्रशासनिक अनुमति, जिम्मेदारी और समन्वय से संबंधित है।

धार्मिक स्थल पर आयोजन को लेकर बहस जैसे बद्रीनाथ

बद्रीनाथ धाम उत्तराखंड के चार धामों में प्रमुख तीर्थस्थल है। इसलिए यहां किसी भी सार्वजनिक या सांस्कृतिक कार्यक्रम को लेकर धार्मिक परंपराओं और श्रद्धालुओं की भावनाओं का विषय स्वाभाविक रूप से संवेदनशील माना जाता है।

महोत्सव के समर्थकों की ओर से इसे स्थानीय संस्कृति, सीमांत क्षेत्रों और पर्यटन को बढ़ावा देने की पहल के रूप में देखा गया, जबकि आलोचकों ने कार्यक्रम के स्वरूप और तेज संगीत को लेकर आपत्ति जताई।

क्या होगा आगे का  निर्णय ?

देवभूमि सांस्कृतिक महोत्सव को लेकर उठे विवाद के बाद अब सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा आयोजन की अनुमति और प्रशासनिक समन्वय से जुड़ी स्थिति का स्पष्ट होना है। साथ ही, बद्रीनाथ जैसे धार्मिक स्थल पर भविष्य में होने वाले सांस्कृतिक आयोजनों के लिए नियमों और जिम्मेदारियों को लेकर स्पष्ट व्यवस्था की जरूरत पर भी चर्चा हो रही है।

फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर इतना स्पष्ट है कि यह मामला केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के विरोध तक सीमित नहीं रहा। धार्मिक मर्यादा, सांस्कृतिक कार्यक्रमों का स्वरूप और सेना-प्रशासन के बीच समन्वय—तीनों पहलू इस विवाद के केंद्र में हैं। सेना की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया आने के बाद तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।

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