अल्मोड़ा खबर: जर्जर छत के नीचे पढ़ने को मजबूर नौनिहाल, शिक्षा की पुकार सरकार तक कब पहुंचेगी?
अल्मोड़ा जिले के स्याल्दे विकासखंड में स्थित आदर्श राजकीय प्राथमिक विद्यालय और उच्च प्राथमिक विद्यालय कलिया लिंगुड़ के बच्चों की हालत बेहद दयनीय है। यहां पढ़ने वाले मासूम छात्र-छात्राएं जर्जर और खस्ताहाल भवन में बैठकर शिक्षा लेने को मजबूर हैं। बरसात के दिनों में उनकी मुश्किलें और बढ़ जाती हैं, क्योंकि भवन की छत से लगातार पानी टपकता रहता है।
बच्चों की मजबूरी
प्राथमिक विद्यालय में इस समय 42 और उच्च प्राथमिक विद्यालय में 55 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। लेकिन दोनों भवनों की छत पूरी तरह खराब हो चुकी है। हल्की सी बारिश होते ही कक्षाएं पानी से भर जाती हैं और किताबें, कॉपियां भीगकर खराब हो जाती हैं। कई बार शिक्षक मजबूरी में बरामदे या खुले आंगन में बच्चों को पढ़ाते हैं। खराब मौसम में बच्चे भीगे कपड़ों और गीली जमीन पर बैठकर शिक्षा ग्रहण करते हैं।
खतरे में मासूमों की जान
छत की हालत इतनी खराब है कि उसमें लगी सरिया तक साफ दिखाई देने लगी है। किसी भी समय छत गिरने का खतरा बना रहता है। बच्चे पढ़ाई करने के साथ-साथ हर पल डर में जी रहे हैं।
सौरभ (कक्षा 5) का कहना है, “बरसात में हमारी कॉपियां और बस्ते भीग जाते हैं, किताबें खराब हो जाती हैं।”
खुशी (कक्षा 7) बताती है, “बारिश में पढ़ाई करना मुश्किल हो जाता है। छत गिरने का डर हर वक्त बना रहता है।”
शिक्षकों की कमी

स्कूल में शिक्षा का स्तर केवल भवन की हालत से ही प्रभावित नहीं है, बल्कि शिक्षकों की कमी भी एक बड़ी समस्या है। प्राथमिक विद्यालय में लंबे समय से तीन पद खाली पड़े हैं। 42 बच्चों को पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक मौजूद नहीं हैं। अभिभावकों का कहना है कि शिक्षा की गुणवत्ता गिर रही है और बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो रहा है।
विद्यालय प्रबंधन समिति की मांग
विद्यालय प्रबंधन समिति के अध्यक्ष रमेश सिंह ने बताया कि छत की मरम्मत के लिए कई बार प्रशासन से मांग की गई है, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। उन्होंने शीघ्र ही भवन की मरम्मत और शिक्षकों की नियुक्ति की मांग की है।
प्रशासन का जवाब
इस मामले में उप शिक्षा अधिकारी प्रज्ञानंद पलीहा ने कहा, “विद्यालय भवन को ठीक करने के लिए प्रस्ताव बनाया गया था। आंगनन में आपत्तियां आ गई थीं। दोबारा प्रस्ताव बनाया जा रहा है। जल्द ही भवन की मरम्मत कर दी जाएगी।”
यह खबर एक बार फिर यह सवाल उठाती है कि जब सरकार शिक्षा पर इतना जोर देती है, तो फिर बच्चों को सुरक्षित और बेहतर वातावरण क्यों नहीं मिल पाता? शिक्षा का अधिकार सिर्फ कागजों पर नहीं, जमीनी हकीकत में भी लागू होना चाहिए।








