टिहरी डैम: विकास की कीमत पर डूबी एक ऐतिहासिक नगरी
टिहरी, उत्तराखंड:
उत्तराखंड के टिहरी डैम का निर्माण देश के सबसे बड़े विकास परियोजनाओं में गिना जाता है, लेकिन इसके साथ जुड़ी है एक ऐसी कहानी, जिसमें विकास के साथ-साथ विस्थापन और दर्द भी शामिल है। इस परियोजना ने जहां बिजली, सिंचाई और रोजगार के नए अवसर दिए, वहीं हजारों लोगों को अपनी जड़ों से उखड़ने पर मजबूर कर दिया।
इतिहास की गोद में बसा टिहरी
सन् 1815 में स्थापित टिहरी शहर तीन नदियों के संगम पर बसा एक समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक केंद्र था। वर्ष 1965 में बांध निर्माण के लिए सर्वे शुरू हुआ, जिसने इस शहर के भविष्य को बदलने की नींव रखी। 1972 में डैम का डिजाइन तैयार हुआ और इसके साथ ही टिहरी के जलमग्न होने की प्रक्रिया तेज हो गई।

विकास का उद्देश्य
टिहरी डैम का मुख्य उद्देश्य बिजली उत्पादन, सिंचाई और क्षेत्रीय विकास था। इस परियोजना से लगभग 620 करोड़ यूनिट बिजली उत्पादन की क्षमता विकसित हुई, जिससे उत्तराखंड सहित कई क्षेत्रों को लाभ मिला। इसके अलावा, लगभग 2.7 लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधा मिली, जिससे कृषि क्षेत्र को मजबूती मिली। पेयजल आपूर्ति और पर्यटन में भी वृद्धि देखी गई।
स्थानीय लोगों पर असर
इस विकास की कीमत स्थानीय निवासियों को चुकानी पड़ी। हजारों परिवारों को अपने घर, खेत, बाग-बगीचे, मंदिर और सांस्कृतिक धरोहर छोड़नी पड़ी। 2005 में टिहरी शहर को खाली करने का नोटिस जारी हुआ और देखते ही देखते पूरा शहर पानी में समा गया। यह घटना आज भी लोगों की यादों में एक दर्दनाक अध्याय के रूप में जीवित है।

विरोध और आंदोलन
टिहरी डैम के खिलाफ 1978 में बांध विरोधी समिति का गठन किया गया। पर्यावरण और संस्कृति की रक्षा के लिए कई आंदोलन हुए। प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा ने इस परियोजना के विरोध में लंबे समय तक अनशन किया और लोगों की आवाज को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाया। हालांकि, इन प्रयासों के बावजूद परियोजना को रोका नहीं जा सका।

डूब गया एक युग
2005 में पुरानी टिहरी पूरी तरह जलमग्न हो गई। इसके साथ ही शहर के आम के बाग, ऐतिहासिक स्थल और मंदिर भी पानी में समा गए। यह सिर्फ एक शहर का डूबना नहीं था, बल्कि एक पूरी संस्कृति और इतिहास का अंत था।

मिश्रित विरासत
आज टिहरी डैम विकास और विस्थापन दोनों का प्रतीक है। एक ओर यह ऊर्जा, सिंचाई और रोजगार का स्रोत बना, वहीं दूसरी ओर यह हमें यह भी सिखाता है कि विकास की योजनाओं में मानव और पर्यावरणीय पहलुओं का संतुलन कितना जरूरी है।
टिहरी की कहानी आज भी यह सवाल उठाती है—क्या विकास की कीमत इतनी बड़ी होनी चाहिए?






