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मेरी संस्कृति ही मेरी पहचान है: देवा धामी

उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहरों में छोलिया नृत्य का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। हजारों वर्षों का इतिहास संजोए यह नृत्य केवल एक कला रूप नहीं, बल्कि शौर्य, पराक्रम और सामूहिकता का प्रतीक है। किंतु विडंबना यह रही कि समय के साथ इस नृत्य को जातिगत पहचान से जोड़ दिया गया और इसके मूल स्वरूप व गौरव को भुला दिया गया।

इसी अंधकार के बीच दीपक सिंह धामी, जिन्हें आज हम देवा धामी के नाम से जानते हैं, एक ऐसे दीप बने जिन्होंने छोलिया को पुनः उसकी असली पहचान दिलाने का संकल्प लिया।

छोलिया नृत्य – परंपरा और इतिहास

छोलिया नृत्य का उद्भव उत्तराखंड के कुमाऊँ अंचल में हुआ माना जाता हैं। प्राचीन काल मैं यह नृत्य राजपूत योद्धाओं द्वारा शौर्य प्रदर्शन के रूप में प्रस्तुत किया जाता था। विवाह बारातों में छोलिया दल ढाल तलवार के साथ नृत्य करते थे, जो समाज में वीरता, शक्ति और एकता का संदेश देता था।

ढोल-दमाऊ, रणसिंहा और नगाड़ों की गूंज के बीच जब छोलियार योद्धा वेशभूषा में नृत्य करते, तो वातावरण पराक्रम से भर उठता। परंतु धीरे-धीरे इस नृत्य को एक जाति विशेष तक

सीमित मान लिया गया और यह भेदभाव इसकी लोकप्रियता पर छाया डालने लगा।

बचपन का लगाव और संघर्ष

देवा धामी का छोलिया से लगाव बचपन से ही था। वे शादियों और बारातों में छोलिया दलों के साथ निर्भय होकर नाचते, मानो यह नृत्य उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा हो। लेकिन समाज ने इसे संकीर्ण नज़र से देखा और उन्हें “ढोली” तथा “सौका” कहकर ताना मारा।

यह उपहास उनके लिए चुनौती बना । उन्होंने निश्चय किया कि छोलिया को उसकी असली पहचान दिलाएँगे और इसे जातिगत सीमाओं से मुक्त करेंगे। इसी संकल्प ने उन्हें संस्कृति संरक्षण के पथ पर आगे बढ़ाया।

पिथौरागढ़, अल्मोड़ा और नैनीताल के छोलिया दलों व स्थानीय कलाकारों को इसमें अवसर मिला।

यह फिल्म युवाओं, खासकर लड़कियों को भी छोलिया से जोड़ने में सफल रही। उत्तराखंड फिल्म विकास परिषद ने इसे राज्य की सर्वोत्तम फिल्म माना और CBFC दिल्ली ने भी सराहा।

” दीया ” – छोलिया और संस्कृति का दीपक

2009 में देवा धामी ने “दीया” राष्ट्रीय समाजसेवी संस्था की स्थापना की। दीया का उददेश्य छोलिया समेत भारतीय लोककला को संरक्षित कर आर्थिक और सामाजिक स्तर पर कलाकारों को सशक्त बनाना था। संस्था ने:

• अस्थायी छोलिया प्रशिक्षण केंद्र खोले। डॉक्यूमेंट्री फिल्में बनाई।

छोलिया कलाकारों को Artist Relief Fund के माध्यम से सहायता दी। • 4000 से अधिक विद्यार्थियों को छोलिया प्रशिक्षण दिया जो की

केंद्र सरकार और राज्य सरकार की सहायता से निरंतर चल रहा है

दीया ने यह सिदध किया कि छोलिया केवल बारातों का नृत्य नहीं, बल्कि कला, संस्कृति और रोजगार का साधन भी बन सकता है।

छोलिया का सामाजिक प्रभाव

देवा धामी ने छोलिया को केवल नृत्य न मानकर सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया।

उत्तराखंड धरोहर

उन्होंने इसे जातिगत बंधनों से बाहर निकाला।

महिलाओं और युवाओं को इससे जोड़ा। कलाकारों को रोज़गार और पहचान दिलाई।

देश-विदेश में मंचन कर छोलिया को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाया। सम्मान और मान्यता

समाज और संस्थाओं ने उन्हें “छोलिया मैन ऑफ़ उत्तराखंड ” की उपाधि दी। वे राष्ट्रीय युवा उत्सव में लगातार उत्तराखंड की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते रहे। उनके प्रयासों से आज छोलिया केवल विवाह नृत्य नहीं, बल्कि संस्कृति, पहचान और गौरव का प्रतीक बन चुका है।

भविष्य की दृष्टि

देवा धामी का सपना है कि छोलिया को विश्व सांस्कृतिक धरोहर का दर्जा मिले। उनका मानना है- “छोलिया केवल तलवार और ढाल का नृत्य नहीं, बल्कि हमारी अस्मिता और पहचान का जीवंत प्रतीक है। “

वे चाहते हैं कि कलाकारों को स्थायी आर्थिक सुरक्षा मिले और छोलिया को शिक्षा और पर्यटन से जोड़कर नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए।

छोलिया नृत्य उत्तराखंड की आत्मा है। इसका पुनर्जागरण केवल मंच पर प्रदर्शन भर नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, समानता और सांस्कृतिक गौरव की पुनर्स्थापना है।

देवा धामी ने जिस साहस और समर्पण से इस विरासत को पुनर्जीवित किया है, वह आने वाली पीढियों के लिए प्रेरणा है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि “मेरा गर्व मेरी आन है, मेरी संस्कृति मेरी पहचान है।”

और सच यही है कि छोलिया की धड़कन के बिना उत्तराखंड की संस्कृति अधूरी है।

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