उत्तराखण्ड में इस बार सर्दियों में भी चल रही है चारधाम यात्रा, उमड़ रहे हैं भक्त, इस यात्रा का तरीका जान लीजिए
चमोली- शीतकाल की ठिठुरती हवाओं के बीच उत्तराखंड के बदरीनाथ और केदारनाथ धाम एक बार फिर भक्तिभाव से जगमगाने लगे हैं। धामों के कपाट बंद हो चुके हैं, लेकिन आस्था का प्रवाह रुका नहीं। परंपरा के अनुसार देवी देवताओं की गद्दी अब अपने शीतकालीन धामों में विराजमान है और भक्त हजारों की संख्या में उनके दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। इस यात्रा के बढ़ते आकर्षण ने पहाड़ की घाटियों को नई जीवन्तता दी है।
पांडुकेश्वर में योग बदरी, ज्योतिर्मठ में नृसिंह मंदिर और ऊखीमठ में ओंकारेश्वर मंदिर इन दिनों आस्था के प्रमुख केंद्र बने हुए हैं। बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी बताते हैं कि इस वर्ष शीतकालीन पूजा के प्रति श्रद्धालुओं का उत्साह पिछली बारों की तुलना में कहीं अधिक है। अब तक 3500 से ज्यादा लोग इन पूजा स्थलों पर दर्शन कर चुके हैं। इसमें अकेले ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर में केदारनाथ और मद्महेश्वर की शीतकालीन गद्दी के दर्शन करने वाले भक्तों की संख्या तीन हजार दो सौ पंद्रह पहुंच चुकी है।
बदरीनाथ धाम के कपाट बन्द होने के बाद शीतकालीन पूजा स्थली योग बदरी पांडुकेश्वर में पिंडियो को स्थापित कर दिया जाता है, इसलिए अब श्रद्धालु यहीं पहुंच रहे हैं। यहां अब तक सत्तावन भक्त दर्शन कर चुके हैं। वहीं ज्योतिर्मठ में नृसिंह मंदिर में दो सौ सत्तावन श्रद्धालु भगवान बदरीविशाल के शीतकालीन स्वरूप के दर्शन कर चुके हैं। हालांकि इन संख्याओं की तुलना ओंकारेश्वर मंदिर से कम है, पर स्थानीय लोग बताते हैं कि दिसंबर से जनवरी के बीच यहां भी तीर्थयात्रियों की संख्या तेजी से बढ़ जाती है।

इस वर्ष शीतकालीन यात्रा को राष्ट्रीय पहचान तब मिली जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मासिक कार्यक्रम मन की बात में इन स्थलों का विशेष उल्लेख किया। प्रधानमंत्री के इस संबोधन के बाद देश विदेश में रहने वाले लोगों में भी इन धामों के प्रति उत्साह बढ़ा है। मंदिर समिति का कहना है कि मन की बात में मिले इस सम्मान ने यात्रा को एक नई ऊर्जा दी है, और राज्य सरकार भी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में इस यात्रा को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं बना रही है।
पिछले कुछ वर्षों में शीतकालीन पूजा को लेकर लोगों का नजरिया बदला है। पहले माना जाता था कि कपाट बंद होने के बाद तीर्थयात्रा भी समाप्त हो जाती है, लेकिन अब भक्त शीतकालीन धामों को उतने ही महत्व से देखते हैं जितना मुख्य धामों को। यहां विराजमान मूर्तियां और पूजा पद्धतियां ठीक वैसी ही रहती हैं जैसी गर्मियों में केदारनाथ और बदरीनाथ में होती हैं। यही कारण है कि भक्त इन्हें साक्षात धाम ही मानकर दर्शन करने आते हैं।
मंदिर समिति और जिला प्रशासन ने तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए तैयारियों को मजबूत किया है। यात्रा मार्गों पर सुरक्षा बल तैनात हैं, चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं और यात्रा स्थलों के आसपास साफ सफाई और रोशनी की व्यवस्था की गई है। स्थानीय होटल व्यवसायी, व्यापारी और पुजारी भी यात्रियों का स्वागत करने में उत्साह दिखा रहे हैं। शीतकालीन यात्रा के दौरान होने वाली महा आरती, विशेष पूजा, वेद मंत्रोच्चार और सांस्कृतिक कार्यक्रम न केवल भक्तों को आध्यात्मिक सुख देते हैं, बल्कि उन्हें हिमालय की जीवंत परंपराओं से भी जोड़ते हैं।
यात्रियों में से कई लोग बताते हैं कि शीतकालीन धामों में मिलने वाला शांति अनुभव बिल्कुल अलग होता है। यहां भीड़ कम होती है, मौसम सर्द जरूर होता है, लेकिन वातावरण इतना पवित्र और शांत कि भक्तों को लगता है जैसे वे देवताओं के और करीब पहुंच गए हों।

शीतकालीन यात्रा सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पहाड़ी प्रदेश की अर्थव्यवस्था का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बनती जा रही है। स्थानीय लोग बताते हैं कि इससे रोजगार बढ़ता है, बाज़ारों में हलचल रहती है और पर्वतीय क्षेत्रों में सर्दियों के दिनों में भी जीवन गतिशील बना रहता है।
उत्तराखंड की धरती पर इस समय आस्था का जो दृश्य दिखाई देता है, वह बताता है कि मौसम चाहे कोई भी हो, मार्ग चाहे जितना कठिन हो, भक्तिभाव कभी कम नहीं होता। बदरीनाथ और केदारनाथ के शीतकालीन धाम भक्तों को उसी श्रद्धा से दर्शन दे रहे हैं जैसे मुख्य धामों में मिलते हैं। इन यात्राओं में शामिल हर व्यक्ति अपने भीतर एक अनोखी शांति और शक्ति लेकर लौटता है।






