Uttarakhand – पहाड़ की पांडव लीला- उत्तराखण्ड में आस्था और विश्वास का लोक महोत्सव
उत्तराखंड की लोक संस्कृति में कुछ परंपराएं ऐसी हैं, जो केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं होतीं, बल्कि पीढ़ियों की स्मृति, आस्था और सामूहिक पहचान को साथ लेकर चलती हैं। पांडव लीला ऐसी ही एक जीवंत परंपरा है, जो आज भी पहाड़ के गांवों में सांस लेती है। यह लीला केवल मंचन नहीं है, बल्कि लोक विश्वास, इतिहास और भावनाओं का संगम है, जहां देवता उतरते हैं, गांव साक्षी बनता है और समय जैसे ठहर जाता है। पांडव लीला का संबंध सीधे तौर पर महाभारत से जुड़ा है। लोक मान्यता है कि अज्ञात वास के दौरान पांडव उत्तराखंड के कई इलाकों में पहुंचे थे और यहीं उन्होंने भेष बदलकर जीवन बिताया था। इसी स्मृति को जीवित रखने के लिए पांडव लीला का आयोजन होता है। यह लीला उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल दोनों अंचलों में अलग अलग रूपों में देखने को मिलती है, लेकिन भाव और आस्था एक जैसी रहती है।
क्यों मनाई जाती है पांडव लीला ? उत्तराखंड के गांवों में पांडवों को केवल ऐतिहासिक पात्र नहीं माना जाता, बल्कि उन्हें देव स्वरूप के रूप में पूजा जाता है। ग्रामीणों की मान्यता है कि पांडव आज भी पहाड़ों की रक्षा करते हैं और संकट के समय गांव की देखभाल करते हैं। पांडव लीला का आयोजन किसी एक व्यक्ति या परिवार के लिए नहीं होता, बल्कि पूरे गांव की सामूहिक जिम्मेदारी होती है। यह आयोजन गांव की सुख समृद्धि, अच्छी फसल, स्वास्थ्य और शांति की कामना के साथ किया जाता है। लोक कथाओं के अनुसार जब पांडव अज्ञात वास में थे, तब वे कई बार उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में पहुंचे। कहा जाता है कि उन्होंने अपने पिता पांडू के श्राद्ध और तर्पण के लिए इन क्षेत्रों में भिक्षा मांगी थी। यही कारण है कि कई गांवों में पांडव लीला को श्राद्ध और तर्पण की परंपरा से भी जोड़ा जाता है। ग्रामीण इसे केवल कथा नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों से जुड़ी स्मृति मानते हैं।

पांडव लीला का इतिहास ? इतिहासकारों और लोक संस्कृति के जानकारों का मानना है कि पांडव लीला की परंपरा सैकड़ों साल पुरानी है। लिखित प्रमाण भले कम हों, लेकिन मौखिक परंपरा के जरिए यह कथा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रही है। पुराने लोग बताते हैं कि जब गांव में कोई बड़ा संकट आता था, तब पांडव लीला का आयोजन किया जाता था। माना जाता था कि इससे गांव में शांति लौट आती है। कुमाऊं क्षेत्र में यह परंपरा विशेष रूप से मजबूत रही है। कई गांवों में पांडवों के नाम पर थान और देवस्थल बने हुए हैं, जहां नियमित पूजा होती है। पांडव लीला इन्हीं देवस्थलों से जुड़ी होती है और कई बार दशकों के अंतराल के बाद आयोजित की जाती है, जैसा कि इस बार चिंतोली गांव में देखने को मिल रहा है।

पांडव लीला में क्या क्या होता है? पांडव लीला कोई तय स्क्रिप्ट वाला नाटक नहीं होता। यह लोक आस्था पर आधारित जीवंत आयोजन होता है। इसमें ढोल नगाड़ों की खास भूमिका होती है। जैसे ही ढोल की थाप तेज होती है, वातावरण बदलने लगता है। ग्रामीण मानते हैं कि इसी दौरान डंगरियों यानी पात्रों में पांडवों का अवतार होता है। डंगरियों का चयन पहले से तय होता है। ये वही लोग होते हैं, जिन्हें गांव और देवता दोनों स्वीकार करते हैं। जब डंगरियों में पांडव उतरते हैं, तो उनकी वाणी, हावभाव और चाल बदल जाती है। वे गांव की समस्याओं पर बात करते हैं, सवाल पूछते हैं और कभी कभी भविष्य के संकेत भी देते हैं। इस दौरान पूरा गांव मौन होकर उन्हें सुनता है। पांडव लीला में केवल पांडव ही नहीं, बल्कि द्रौपदी, कौरव और अन्य पात्रों का भी उल्लेख आता है। हालांकि यह मंचन की तरह नहीं होता, बल्कि संवाद और संकेतों के जरिए कथा आगे बढ़ती है। कई बार पांडव गांव वालों से सीधे संवाद करते हैं, जिसे लोग आशीर्वाद या चेतावनी के रूप में लेते हैं।
रात में होता है सबसे खास दृश्य? पांडव लीला का सबसे खास और भावनात्मक हिस्सा रात का होता है। जैसे जैसे रात गहराती है, ढोल नगाड़ों की गूंज और तेज हो जाती है। अलाव के आसपास लोग जमा होते हैं। माना जाता है कि इसी समय पांडवों की उपस्थिति सबसे ज्यादा प्रभावी होती है। ग्रामीण बताते हैं कि कई बार डंगरियों के शरीर से असाधारण शक्ति दिखाई देती है, जिसे लोग देवत्व का संकेत मानते हैं। इस दौरान महिलाएं पारंपरिक गीत गाती हैं और बुजुर्ग आंखों में आस्था लिए सब कुछ देखते रहते हैं। बच्चे पहली बार यह दृश्य देखकर डरते भी हैं और चकित भी होते हैं। यही अनुभव उन्हें अपनी संस्कृति से जोड़ता है।

इस बार कहां कहां हो रही है पांडव लीला? इस बार पांडव लीला की खास बात यह है कि यह 25 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद आयोजित हो रही है। स्याल्दे ब्लॉक की ग्राम पंचायत चिंतोली में इसका शुभारंभ हो चुका है और यह तीन जनवरी तक चलेगी। चिंतोली के ग्रामीणों के लिए यह केवल आयोजन नहीं, बल्कि स्मृति का पुनर्जागरण है। इसके साथ ही अल्मोड़ा जिले के मुनानी क्षेत्र, गढ़वाल मंडल में पौड़ी जिले के डढौली डुबडीकोट, चमोली जिले के कफलसैण और बजाणी गांवों के लोग भी इस आयोजन में भाग ले रहे हैं। अलग अलग क्षेत्रों से आए लोग अपने अपने लोक गीत, वाद्य और परंपराएं साथ लाते हैं, जिससे यह आयोजन और भी समृद्ध हो जाता है।
आयोजन की सामूहिक जिम्मेदारी ? पांडव लीला का आयोजन किसी सरकारी मंच या संस्था पर निर्भर नहीं होता। इसकी पूरी जिम्मेदारी गांव के लोगों की होती है। कमेटी बनती है, जिसमें अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और कोषाध्यक्ष जैसे पद होते हैं। इस बार चिंतोली गांव में बचे सिंह बेलवाल, मान सिंह बेलवाल और अन्य ग्रामीणों ने मिलकर इस आयोजन को सफल बनाने के लिए महीनों मेहनत की है। खर्च की व्यवस्था भी गांव वाले आपस में मिलकर करते हैं। कोई अनाज देता है, कोई लकड़ी, तो कोई श्रम। यही सामूहिकता पांडव लीला की सबसे बड़ी ताकत है।
नई पीढ़ी और पांडव लीला? आज के समय में जब गांव से शहर की दूरी बढ़ रही है और युवा रोजगार के लिए बाहर जा रहे हैं, ऐसे में पांडव लीला जैसी परंपराएं नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम करती हैं। आयोजकों का कहना है कि उनका उद्देश्य केवल आयोजन करना नहीं, बल्कि इस धरोहर को अगली पीढ़ी तक सुरक्षित पहुंचाना है। कई युवा जो शहरों में रहते हैं, वे भी खास तौर पर गांव लौटकर पांडव लीला में हिस्सा लेते हैं। यह उनके लिए केवल धार्मिक अनुभव नहीं, बल्कि अपनी पहचान से जुड़ने का मौका होता है।
पांडव लीला क्यों है आज भी प्रासंगिक? पांडव लीला आज भी इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि यह लोगों को जोड़ती है। यह गांव में संवाद का माध्यम बनती है, जहां लोग अपनी समस्याएं देवता के सामने रखते हैं। यह आयोजन समाज में संतुलन बनाए रखने का भी काम करता है। उत्तराखंड की बदलती सामाजिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों के बीच पांडव लीला यह याद दिलाती है कि परंपरा और आधुनिकता साथ साथ चल सकती हैं। यही कारण है कि सदियों पुरानी यह लोक परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है, जितनी कभी रही होगी।






