Devender Bohra: उत्तराखण्ड का ‘उभरता’ क्रिकेटर देवेन्द्र बोरा, विजय हजारे ट्रॉफी में ‘हिटमैन’ रोहित शर्मा को ज़ीरो पर किया आउट
बागेश्वर- देवभूमि उत्तराखंड के छोटे से पहाड़ी जिले बागेश्वर से निकला एक नाम आज देश के क्रिकेट प्रेमियों के बीच चर्चा में है। वजह बनी विजय हजारे ट्रॉफी का वह मुकाबला, जिसमें उत्तराखंड के तेज गेंदबाज देवेंद्र सिंह बोरा ने भारतीय क्रिकेट के सबसे बड़े सितारों में शामिल रोहित शर्मा को खाता खोले बिना पवेलियन भेज दिया। भले ही वह मैच उत्तराखंड की टीम जीत नहीं पाई, लेकिन उस एक गेंद ने देवेंद्र के संघर्ष, मेहनत और सपनों को पूरे देश के सामने रख दिया। उत्तराखंड प्रीमियर लीग में भी देवेन्द्र ने देहरादून वॉरियर्स की ओर से हिस्सा लिया था।
राजस्थान के जयपुर स्थित सवाई मानसिंह स्टेडियम में 26 दिसंबर को खेले गए विजय हजारे ट्रॉफी के इस मुकाबले में मुंबई और उत्तराखंड आमने सामने थे। मुंबई ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 330 रनों का बड़ा स्कोर खड़ा किया। लक्ष्य का पीछा करने उतरी उत्तराखंड की टीम 280 रन ही बना सकी और मुकाबला उसके हाथ से निकल गया। स्कोर बोर्ड भले ही हार की कहानी कह रहा हो, लेकिन मैच की शुरुआत में हुआ एक वाकया पूरे मुकाबले पर भारी पड़ गया।
मैच का पहला ओवर उत्तराखंड की ओर से देवेंद्र सिंह बोरा को सौंपा गया। सामने थी मुंबई जैसी मजबूत टीम और क्रीज पर आने वाले थे रोहित शर्मा। देवेंद्र के लिए यह पल किसी परीक्षा से कम नहीं था। पहाड़ों से निकलकर देश के सबसे बड़े मंच पर खड़े इस युवा गेंदबाज के सामने विश्व कप जीत चुके कप्तान बल्लेबाजी करने आ रहे थे। लेकिन देवेंद्र ने डर को खुद पर हावी नहीं होने दिया।

ओवर की पांचवीं गेंद पर देवेंद्र ने हल्की बाउंसर डाली। पिच से मिली उछाल ने रोहित शर्मा को चौंका दिया। गेंद बल्ले पर सही से नहीं आई और स्क्वायर लेग की दिशा में चली गई। वहां खड़े फील्डर ने कैच लपक लिया। रोहित शर्मा शून्य पर आउट हो चुके थे। स्टेडियम में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया और फिर उत्तराखंड के खिलाड़ियों के चेहरों पर खुशी साफ दिखने लगी। देवेंद्र के लिए यह केवल एक विकेट नहीं था, बल्कि वर्षों की मेहनत का इनाम था।
मैच के बाद देवेंद्र सिंह बोरा ने बातचीत में बताया कि इससे पहले वाले मैच में उनका प्रदर्शन अच्छा रहा था और उन्होंने चार विकेट लिए थे। आत्मविश्वास उनके साथ था। रोहित शर्मा के क्रीज पर आने के बाद उन्होंने पिच की उछाल को ध्यान में रखते हुए फील्डिंग में थोड़ा बदलाव किया। स्क्वायर लेग और फाइन लेग के फील्डर को बाहर किया गया। योजना थी कि गेंद में उछाल का फायदा लिया जाए। वही योजना काम कर गई और रोहित शर्मा कैच दे बैठे।
देवेंद्र बताते हैं कि क्रिकेट उनके लिए केवल खेल नहीं, बल्कि जिंदगी बदलने का जरिया है। वह पिछले कई वर्षों से लगातार मेहनत कर रहे हैं। साल 2019 से वह उत्तराखंड क्रिकेट एसोसिएशन के साथ जुड़े हुए हैं। उनके खेल को निखारने में कोच मनीष झा का अहम योगदान रहा है। इसके अलावा एसोसिएशन के सचिव महिम वर्मा का सहयोग भी उन्हें लगातार मिलता रहा है। देवेंद्र का कहना है कि अगर सही मार्गदर्शन और भरोसा मिले तो पहाड़ का खिलाड़ी भी बड़े मंच पर अपनी पहचान बना सकता है।
देवेंद्र सिंह बोरा का सफर आसान नहीं रहा। उत्तराखंड के बागेश्वर जिले की बागेश्वर तहसील के छोटे से गांव छतीना में जन्मे देवेंद्र एक साधारण परिवार से आते हैं। उनके पिता बलवंत सिंह बोरा किसान हैं और मां नेमा देवी गृहिणी हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी, लेकिन सपनों में कोई कमी नहीं थी। देवेंद्र ने अपनी शुरुआती पढ़ाई मंडल शेरा इंटर कॉलेज बागेश्वर से की। पढ़ाई के साथ साथ क्रिकेट का जुनून भी बढ़ता चला गया।
अपने शुरुआती दिनों के संघर्ष को याद करते हुए देवेंद्र बताते हैं कि कई बार हालात ने उन्हें मैदान से दूर करने की कोशिश की। रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए उन्हें गुजरात के सूरत शहर में करीब छह महीने तक एक ज्वेलरी की दुकान में नौकरी भी करनी पड़ी। दिन भर काम और रात को क्रिकेट के सपने। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। इसी दौरान बागेश्वर के उनके शुरुआती कोच हैरी कर्मयाल ने उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। कोच ने न केवल उनकी तकनीक सुधारी, बल्कि आत्मविश्वास भी दिया।
धीरे धीरे देवेंद्र का खेल निखरने लगा। उत्तराखंड प्रीमियर लीग में उन्होंने देहरादून वॉरियर्स की ओर से खेला। उस समय भले ही उन्हें बड़ी सफलता नहीं मिली, लेकिन अनुभव जरूर मिला। इसी सीजन रणजी ट्रॉफी में उन्होंने छह विकेट लेकर अपने इरादे साफ कर दिए थे। विजय हजारे ट्रॉफी में रोहित शर्मा का विकेट उसी मेहनत का अगला कदम साबित हुआ।
देवेंद्र का यह सफर उत्तराखंड के उन हजारों युवाओं के लिए उम्मीद बन गया है, जो छोटे गांवों और सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं। पहाड़ों में खेल के साधन कम हैं, मैदान कम हैं, लेकिन जज्बा कम नहीं है। देवेंद्र जैसे खिलाड़ी यह दिखाते हैं कि अगर मेहनत सच्ची हो तो रास्ता जरूर निकलता है।
क्रिकेट विशेषज्ञ भी मानते हैं कि देवेंद्र में आगे बढ़ने की पूरी क्षमता है। उनकी गेंदबाजी में उछाल है, लाइन और लेंथ पर नियंत्रण है और सबसे बड़ी बात यह कि वह बड़े खिलाड़ियों से डरते नहीं हैं। आने वाले समय में अगर उन्हें लगातार मौके मिलते रहे तो वह उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि भारतीय क्रिकेट के लिए भी उपयोगी साबित हो सकते हैं।
मैच के नतीजे भले ही उत्तराखंड के पक्ष में नहीं रहे, लेकिन उस एक विकेट ने देवेंद्र सिंह बोरा का नाम क्रिकेट की चर्चा में ला दिया। बागेश्वर की पहाड़ियों से जयपुर के मैदान तक पहुंचा यह सफर अभी लंबा है। देवेंद्र की कहानी यही बताती है कि सपनों का पीछा करने वाले अक्सर मंजिल तक पहुंच ही जाते हैं। पहाड़ का यह बेटा अब नई उम्मीदों और नए हौसले के साथ आगे बढ़ रहा है।






