Revered Premanand Govind Sharan Maharaj Ji- जब शरीर हार जाए, और आत्मा मुस्कुरा दे
कल्पना कीजिए—
एक दिन डॉक्टर गंभीर स्वर में कहे, “आपकी दोनों किडनियाँ फेल हो चुकी हैं। ज़्यादा समय नहीं बचा।”
उस पल क्या बचेगा?
शब्द शून्य हो जाएंगे, समय ठहर जाएगा, और जीवन एक ही झटके में सिमट जाएगा।
परिवार के चेहरे आँखों के सामने तैरने लगेंगे, भविष्य धुँधला हो जाएगा, और मन भय से भर उठेगा।
लेकिन क्या हो अगर उसी क्षण कोई व्यक्ति मुस्कुरा दे?
यही असंभव-सा काम किया पूज्य प्रेमानंद गोविंद शरण महाराज जी ने।

जब डॉक्टर ने कहा कि बीमारी लाइलाज है और जीवन सीमित है, तब महाराज जी ने शांत स्वर में उत्तर दिया—
“बीमारी शरीर को हुई है, मन को नहीं। और मेरा मन तो राधा रानी के चरणों में है।”
उन्होंने अपनी एक किडनी का नाम राधा रखा, दूसरी का कृष्ण, और कहा—
“जब दोनों मेरे भीतर हैं, तो रोग मेरा क्या बिगाड़ लेगा?”
यह कोई वाक्य नहीं था।
यह आत्मा की विजय घोषणा थी।
जहाँ पीड़ा भी प्रसाद बन जाती है
आज महाराज जी प्रतिदिन डायलिसिस से गुजरते हैं—एक अत्यंत पीड़ादायक प्रक्रिया।
लेकिन आश्चर्य यह है कि दर्द उन्हें तोड़ नहीं पाया।
बल्कि उन्होंने दर्द को साधना बना लिया।

उनका कहना है—
“जब कष्ट भगवान की ओर से आए, तो वह भी प्रसाद बन जाता है।”
यही कारण है कि इतनी विकट परिस्थिति में भी उनके चेहरे पर शांति है, आँखों में करुणा है और वाणी में ऐसा माधुर्य कि सुनने वाला स्वयं को वृंदावन में अनुभव करने लगता है।
वृंदावन जो एक देह में सांस लेता है
प्रेमानंद जी महाराज का आश्रम वृंदावन में है—
वह नगरी जहाँ हवा भी “राधे-राधे” कहती है।
जहाँ दीवारें, गलियाँ, पत्ते—सब भक्ति में लीन हैं।

उन्हें सामने देखकर ऐसा लगता है जैसे वृंदावन स्वयं मानव रूप में खड़ा हो।
उनकी वाणी बांसुरी की धुन है,
उनका मौन मृदंग की थाप,
और उनकी आँखों में श्रीकृष्ण की झलक।
वे कथा नहीं सुनाते—
वे प्रेम जगा देते हैं।
त्याग से जन्मा तेज
उनका जन्म 1969 में कानपुर के पास एक साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ।
नाम था—अनिरुद्ध।
जहाँ पाँच साल के बच्चे खिलौनों में खोए रहते हैं,
वहाँ अनिरुद्ध रामायण और गीता में डूबे रहते थे।

तेरह वर्ष की उम्र में—
जब दुनिया सपने देखना सिखाती है,
उन्होंने संसार छोड़ दिया।
रात के तीन बजे,
एक बालक—
माँ-बाप, सुख-सुविधा, सुरक्षा—सब त्यागकर
केवल एक नाम लेकर निकल पड़ा—कृष्ण।
लोग रोए, पर उस बालक की आँखों में अद्भुत शांति थी।
काशी पहुँचे।
गंगा, ध्यान, भिक्षा—यही जीवन बन गया।
भोजन मिले तो भी भजन,
ना मिले तो गंगाजल और संतोष।
लोगों ने कहा—“यह पागल है।”
उन्होंने मुस्कुराकर कहा—
“अगर यह पागलपन भगवान के लिए है, तो मुझे स्वीकार है।”
गुरु-सेवा से प्रेमानंद तक
वृंदावन में उन्हें गुरु मिले—श्री गौरंगी शरण जी महाराज।
वहाँ दस वर्षों तक उन्होंने गुरु-सेवा की—
बर्तन मांजे, वस्त्र धोए, कुटिया साफ की।
एक दिन गुरु को भोजन नहीं मिला,
तो उन्होंने भी तीन दिन तक कुछ नहीं खाया।
कहा—
“गुरु भूखे हों, तो शिष्य कैसे खा सकता है?”
यहीं अनिरुद्ध पिघले…
और प्रेमानंद बन गए।
जब धर्म की दीवारें गिर जाती हैं
जब उनकी तबीयत बिगड़ती है,
तो सिर्फ मंदिरों में नहीं—
मजारों में भी दुआ होती है।
हाल ही में एक मुस्लिम युवक ने मदीना से उनके लिए दुआ मांगी।
उस दृश्य ने बता दिया—
सच्ची भक्ति का कोई धर्म नहीं होता।
जहाँ प्रेम है, वहीं ईश्वर है।
जीवन की तीन अमूल्य सीख
1. दर्द को बुद्धि में बदलो
पीड़ा अंत नहीं, प्रवेश द्वार है।
जब मन ईश्वर से जुड़ जाए, तो बीमारी भी हार मान लेती है।
2. छोड़ो, ताकि पा सको
त्याग पलायन नहीं—जागरण है।
कभी-कभी सबसे बड़ा लाभ, छोड़ने से ही मिलता है।
3. प्रेम सीमाओं से परे होता है
धर्म, भाषा, पहचान—सब पीछे छूट जाते हैं
जब प्रेम सच्चा होता है।
एक संत नहीं, एक सेत
प्रेमानंद जी महाराज केवल साधु नहीं—
वे मनुष्य और मनुष्य के बीच,
आत्मा और परमात्मा के बीच एक सेतु हैं।
वे कहते हैं—
“संसार को मत बदलो, खुद को बदलो।”
और सच यही है—
जिसने राधा रानी की शरण पा ली,
उसका हर आँसू भी आशीर्वाद बन जाता है।
जय श्री राधे।
जय श्री कृष्ण।






