December Cold: ना बर्फ, ना कड़ाके की ठंड! पहाड़ों में इस बार सर्दी क्यों कर रही धोखा—कारण जानिए
चमोली- दिसंबर की ठंड आमतौर पर पहाड़ों पर सफेद चादर बिछा देती है। उत्तराखंड, हिमाचल और जम्मू कश्मीर की ऊंची चोटियों पर बर्फ गिरने लगती है, चारधाम, औली, हर्षिल, मुनस्यारी जैसे इलाकों में सैलानियों की रौनक बढ़ जाती है और किसानों को भी राहत मिलती है। लेकिन इस बार तस्वीर बिल्कुल अलग है। सर्दी का मिजाज बदला हुआ है और पहाड़ियां बर्फबारी को तरस रही हैं।
दिसंबर का दूसरा पखवाड़ा भी लगभग खत्म होने को है, लेकिन अब तक उत्तराखंड समेत पूरे पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में ताजा बर्फबारी नहीं हुई है। आम तौर पर नवंबर के आखिर या दिसंबर की शुरुआत में ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फ गिरने लगती है, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक इसका सबसे बड़ा कारण पश्चिमी विक्षोभ का कमजोर रहना है। यही सिस्टम सर्दियों में बारिश और बर्फबारी लाता है, लेकिन इस बार यह या तो आ ही नहीं रहा या फिर बहुत कमजोर होकर निकल जा रहा है।
उत्तराखंड में हालात और भी चिंताजनक हैं। राज्य में पिछले 55 दिनों से ठीक ढंग की बारिश नहीं हुई है। आखिरी बार 22 अक्टूबर को करीब सात घंटे तक बारिश हुई थी। उस दौरान देहरादून में करीब 22 मिलीमीटर और चंपावत में करीब 19 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई थी। इसके बाद कभी कभार चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ के ऊंचाई वाले इलाकों में हल्की बूंदाबांदी जरूर हुई, लेकिन वह नाम मात्र की रही। मैदानी और मध्य पहाड़ी इलाकों में तो पूरी तरह सूखा बना हुआ है।
सिर्फ पहाड़ ही नहीं, मैदानों में भी सर्दी का असर कमजोर नजर आ रहा है। देहरादून, दिल्ली, चंडीगढ़ और जम्मू जैसे शहरों में दिन का तापमान सामान्य से ऊपर चल रहा है। कई जगह अधिकतम तापमान 24 से 25 डिग्री तक पहुंच गया है। दिसंबर के इन दिनों में जहां लोग ठिठुरन महसूस करते थे, वहीं इस बार दिन में तेज धूप निकल रही है। लोग धूप सेंकते हुए गर्म कपड़े उतारकर बैठे नजर आ रहे हैं। ठंड का वह एहसास, जो आमतौर पर इस मौसम में होता है, इस बार गायब सा है।

मौसम के इस बदले मिजाज का असर खेती पर भी साफ दिखने लगा है। उत्तर भारत में पोस्ट मानसून का समय आमतौर पर बारिश के लिहाज से अहम होता है, लेकिन इस बार यह दौर पूरी तरह सूखा रहा। तराई और मैदानी इलाकों में गेहूं, सरसों और गन्ने की बुआई हो चुकी है, लेकिन खेतों में नमी की भारी कमी है। किसानों को बार बार सिंचाई करनी पड़ रही है, जिससे लागत बढ़ रही है। अगर आगे भी बारिश नहीं हुई तो फसल पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।
पहाड़ों में स्थिति और ज्यादा चिंता बढ़ाने वाली है। यहां मोटा अनाज, मटर, हरी सब्जियां और प्याज की पनीरी के लिए नियमित पानी देना जरूरी हो गया है। छोटे किसान, जो बारिश और बर्फ पर निर्भर रहते हैं, अब प्राकृतिक पानी के बिना जूझ रहे हैं। कई जगहों पर पारंपरिक जल स्रोत भी कमजोर पड़ने लगे हैं।
सेब उत्पादकों के लिए भी यह मौसम चिंता का कारण बन गया है। विशेषज्ञ बताते हैं कि सेब की अच्छी पैदावार के लिए दिसंबर की बर्फबारी बेहद जरूरी मानी जाती है। बर्फ से जमीन में नमी बनी रहती है और पेड़ों को जरूरी ठंड मिलती है। अगर इस साल बर्फ नहीं गिरी या बहुत देर से गिरी, तो आने वाले सीजन में सेब की पैदावार पर असर पड़ सकता है।
पर्यटन के लिहाज से भी हालात अलग हैं। चारधाम की चोटियां, हर्षिल, औली, गोरसों, चोपता, कुमाऊं के मुनस्यारी, धारचूला, मिलम, जोहार घाटी, पंचाचूली और नंदा देवी जैसे इलाकों में अभी तक ताजा हिमपात नहीं हुआ है। कुछ जगहों पर तो पुरानी बर्फ भी तेजी से पिघल चुकी है और पहाड़ नंगे दिखाई देने लगे हैं। औली जैसे स्कीइंग स्थलों पर बर्फ का इंतजार किया जा रहा है, क्योंकि बिना बर्फ के शीतकालीन पर्यटन अधूरा सा लगता है।
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु में आ रहे बदलाव अब साफ दिखने लगे हैं। सर्दियों में बारिश और बर्फबारी का पैटर्न बदल रहा है। कभी अचानक ज्यादा बारिश हो जाती है, तो कभी लंबे समय तक सूखा बना रहता है। यही वजह है कि सर्दी का मिजाज हर साल कुछ नया रूप दिखा रहा है।
हालांकि अभी भी उम्मीद बाकी है। मौसम विभाग के अनुसार आगे के दिनों में अगर पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय होता है, तो ऊंचाई वाले इलाकों में बारिश और बर्फबारी हो सकती है। लेकिन फिलहाल जो हालात हैं, वे यही बताते हैं कि इस बार की सर्दी सामान्य से अलग चल रही है।
पहाड़ों में रहने वाले लोग आसमान की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं। किसान बारिश और बर्फ की बाट जोह रहे हैं, सैलानी सफेद पहाड़ों का इंतजार कर रहे हैं और पर्यावरण से जुड़े लोग बदलते मौसम को लेकर चिंता जता रहे हैं। सवाल यही है कि क्या आने वाले दिनों में पहाड़ों पर फिर से बर्फ की चादर बिछेगी या यह सर्दी बिना बर्फ के ही गुजर जाएगी।






