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Smoke in the forests of Joshimath – हिमालय की गोद में आग का तांडव: जोशीमठ के जंगलों में धुआँ, लपटें और सूखती हरियाली

चमोली – उत्तराखंड का चमोली जिला, जो आमतौर पर इन दिनों बर्फ से ढकी चोटियों और शांत घाटियों के लिए जाना जाता है, इस समय भयावह दृश्य का साक्षी बन गया है। जहां जनवरी की ठंड में हिमालय की ऊंची चोटियों पर सफेद बर्फ की परत चमकनी चाहिए थी, वहां अब आग की लाल लपटें उठ रही हैं और काले धुएं की चादर पूरी घाटी पर छा गई है। विश्व प्रसिद्ध नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान के अंतर्गत आने वाले तपोवन और हेलंग रेंज के जंगलों में भीषण आग ने प्रकृति के संतुलन को गंभीर चुनौती दे दी है।

जोशीमठ क्षेत्र के हेलंग और अणिमठ के आसपास फैले विशाल वन क्षेत्र बीते कुछ दिनों से लगातार जल रहे हैं। देर रात भड़की आग ने देखते ही देखते विकराल रूप धारण कर लिया और हरे-भरे जंगलों को अपनी चपेट में ले लिया। सूखी घास, चीड़ की पत्तियां और पेड़ों की मोटी टहनियां आग के लिए ईंधन बन गईं। तेज हवाओं ने लपटों को और भड़का दिया, जिससे आग पर काबू पाना और कठिन होता जा रहा है।

घाटी का पूरा वातावरण धुएं से भर गया है। दूर से देखने पर पहाड़ियां काली परत में लिपटी नजर आती हैं, मानो किसी ने हरियाली पर राख की चादर ओढ़ा दी हो। स्थानीय लोगों का कहना है कि सुबह होते ही सूरज की रोशनी भी धुएं के बीच धुंधली पड़ जाती है और सांस लेना तक मुश्किल हो रहा है। आंखों में जलन, गले में खराश और घुटन जैसी समस्याएं आम हो गई हैं।

इस बार हालात इसलिए भी ज्यादा गंभीर हैं क्योंकि लंबे समय से इलाके में न बारिश हुई है और न ही बर्फबारी। आमतौर पर जनवरी में पहाड़ों पर बर्फ गिरने से जंगलों में नमी बनी रहती है, जिससे आग लगने की घटनाएं कम होती हैं। लेकिन इस साल मौसम की बेरुखी ने जंगलों को सूखा और बेहद संवेदनशील बना दिया है। सूखे पत्तों और झाड़ियों ने आग को तेजी से फैलने का रास्ता दे दिया।

एक जंगल में आग पर काबू पाने की कोशिशें चल ही रही होती हैं कि तभी किसी दूसरे हिस्से से नई लपटें उठने लगती हैं। वन विभाग के कर्मचारियों और स्थानीय ग्रामीणों की टीमें आग बुझाने में जुटी हैं, लेकिन दुर्गम पहाड़ी इलाके, तेज हवाएं और लगातार बदलती दिशा हालात को और जटिल बना रही हैं। कई स्थानों पर आग इतनी ऊंचाई पर फैली है कि वहां तक पहुंचना भी जोखिम भरा साबित हो रहा है।

नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान जैव विविधता के लिहाज से बेहद संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। यहां दुर्लभ वनस्पतियां, जड़ी-बूटियां और वन्य जीवों की कई प्रजातियां पाई जाती हैं। आग की चपेट में आने से न केवल पेड़-पौधों का भारी नुकसान हुआ है, बल्कि जंगली जानवरों के प्राकृतिक आवास भी नष्ट हो रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की आग पारिस्थितिकी तंत्र को लंबे समय तक प्रभावित कर सकती है।

स्थानीय निवासियों में भी चिंता गहराती जा रही है। उनका कहना है कि पहले सर्दियों में बर्फ गिरती थी, जिससे जंगलों में नमी बनी रहती थी और जलस्रोत भी भरपूर रहते थे। अब न बर्फ है, न बारिश, और ऊपर से आग ने हरियाली को भी निगलना शुरू कर दिया है। इससे आने वाले महीनों में पानी की किल्लत और भूस्खलन का खतरा भी बढ़ सकता है।

प्रशासन की ओर से निगरानी बढ़ा दी गई है और संवेदनशील इलाकों में गश्त तेज कर दी गई है। लोगों से अपील की जा रही है कि वे जंगलों के पास आग न जलाएं और किसी भी तरह की लापरवाही से बचें। हालांकि, मौसम में बदलाव और बारिश के बिना आग पर पूरी तरह काबू पाना आसान नहीं होगा।

हिमालय की गोद में फैली यह आग केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि बदलते मौसम और मानव लापरवाही की गंभीर चेतावनी भी है। जोशीमठ की घाटियों में उठता यह धुआं मानो प्रकृति की कराह बनकर पूरे प्रदेश को आगाह कर रहा है कि अगर समय रहते संतुलन नहीं संभाला गया, तो हरियाली की जगह राख ही बची रह जाएगी।

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