Fight for Shankaracharya’s honour – शंकराचार्य के सम्मान की लड़ाई: हर की पौड़ी पर गूंजा संतों का आक्रोश, माफी नहीं तो कटेगी शिखा
हरिद्वार – प्रयागराज माघ मेले में उपजे विवाद ने अब उत्तराखंड की धर्मनगरी हरिद्वार को भी आंदोलित कर दिया है। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में साधु-संतों का आक्रोश खुलकर सामने आया, जब हर की पौड़ी पर भारत साधु समाज और श्री अखंड परशुराम अखाड़े के नेतृत्व में जोरदार धरना प्रदर्शन हुआ। संत समाज ने साफ शब्दों में चेतावनी दी कि यदि प्रयागराज प्रशासन ने शंकराचार्य से सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांगी, तो वे अपनी शिखा तक कटवाने से पीछे नहीं हटेंगे।
यह धरना केवल विरोध का प्रतीक नहीं था, बल्कि संत समाज की उस पीड़ा और अपमान की अभिव्यक्ति था, जो उनके अनुसार प्रयागराज प्रशासन द्वारा शंकराचार्य और उनके शिष्यों के साथ किए गए व्यवहार से उपजी है। संतों का कहना है कि माघ मेले के दौरान जिस तरह शंकराचार्य के शिष्यों से बदसलूकी की गई और बाद में स्वयं शंकराचार्य की पदवी पर सवाल खड़े किए गए, वह न केवल अनुचित है बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था पर सीधा आघात है।

हर की पौड़ी पर हुए इस एक घंटे के धरने में बड़ी संख्या में साधु-संत जुटे। परशुराम अखाड़े के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने मंच से तीखी घोषणा करते हुए कहा कि यदि जिला प्रशासन ने तुरंत माफी नहीं मांगी, तो वे पहले अपनी शिखा खोलेंगे और आवश्यकता पड़ी तो उसे कटवाने जैसा कठोर कदम भी उठाएंगे। उनके अनुसार, शिखा केवल एक परंपरा नहीं बल्कि सनातन संस्कृति और साधु जीवन की पहचान है, और उसे त्यागने की चेतावनी देना प्रशासन के रवैये के खिलाफ अंतिम प्रतिरोध होगा।
धरने में मौजूद भारत साधु समाज के राष्ट्रीय संगठन मंत्री स्वामी प्रबोधानंद गिरी और जिला अध्यक्ष स्वामी सत्यवृतानंद गिरी ने भी इस मुद्दे पर गहरी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि शंकराचार्य को शंकराचार्य घोषित करने का अधिकार किसी प्रशासन को नहीं है। यह संत समाज की परंपरा और आस्था का विषय है, जिसमें सरकारी तंत्र का हस्तक्षेप अस्वीकार्य है। उनका कहना था कि प्रयागराज में जो कुछ हुआ, वह केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं बल्कि पूरे सनातन धर्म के संत समाज का अपमान है।
संतों ने एक स्वर में मांग की कि उत्तर प्रदेश सरकार का कोई वरिष्ठ प्रतिनिधि या स्वयं मुख्यमंत्री का दूत शंकराचार्य से मिलकर क्षमा याचना करे। उनका कहना था कि संत समाज स्वभाव से सरल और क्षमाशील होता है, लेकिन जब बार-बार अपमान किया जाए और कोई खेद प्रकट न करे, तो विरोध अनिवार्य हो जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि जिन अधिकारियों ने शिष्यों से दुर्व्यवहार किया, उनके खिलाफ तत्काल कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई भी धर्मगुरुओं के सम्मान के साथ खिलवाड़ न कर सके।

श्री अखंड परशुराम अखाड़े के अध्यक्ष पंडित अधीर कौशिक ने भावुक शब्दों में कहा कि प्रयागराज में हमारे पूज्य शंकराचार्य और उनके शिष्यों के साथ जो व्यवहार हुआ, वह बर्दाश्त करने योग्य नहीं है। उन्होंने बताया कि धरने के दौरान उन्होंने प्रतीकात्मक रूप से अपनी शिखा खोल दी है और यह तब तक खुली रहेगी, जब तक प्रशासन माफी नहीं मांगता। यदि प्रशासन अपनी हठधर्मिता पर अड़ा रहा, तो संत समाज और भी कठोर कदम उठाने को मजबूर होगा।
इस पूरे घटनाक्रम ने धार्मिक और प्रशासनिक संबंधों पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर प्रशासनिक व्यवस्था कानून और अनुशासन की बात कर रही है, तो दूसरी ओर संत समाज इसे आस्था और परंपरा से जुड़ा गंभीर विषय मान रहा है। हर की पौड़ी पर गूंजा यह विरोध केवल एक धरना नहीं, बल्कि उस सम्मान की मांग है, जिसे संत समाज अपने गुरुओं के लिए अनिवार्य मानता है।
अब सबकी निगाहें प्रयागराज प्रशासन और उत्तर प्रदेश सरकार की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। क्या माफी मांगी जाएगी, या संत समाज का यह आंदोलन और उग्र रूप लेगा? इतना तय है कि यह विवाद केवल एक शहर या एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे देश के धार्मिक समाज में चर्चा का विषय बन चुका है।






