देखा नहीं होगा ऐसा धरना जमा देने वाली ठंड में जारी है आन्दोलन
स्याल्दे (अल्मोड़ा) – आमतौर पर शांत रहने वाली कुमाऊं की पहाड़ियों में इन दिनों खामोशी नहीं, बल्कि सुलगते सवाल गूंज रहे हैं। ये सवाल सड़कों के हैं, बेसहारा पशुओं के हैं, और सबसे बढ़कर सम्मान से जीने के अधिकार के हैं। चौकोट क्षेत्र में चल रहा आंदोलन अब केवल एक धरना या अनशन नहीं रह गया है, बल्कि यह पहाड़ के लोगों के धैर्य, दर्द और दृढ़ संकल्प की कहानी बन चुका है। आंदोलन को आज 36 दिन पूरे हो चुके हैं, लेकिन लोगों के हौसले अभी भी उतने ही मजबूत हैं जितने पहले दिन थे।
चौकोट संघर्ष समिति की अगुवाई 27 अक्टूबर से शुरू हुआ यह आंदोलन चौकोट संघर्ष समिति के बैनर तले चल रहा है। पैठाना, तिमली, गनसीड़ा और स्याल्दे जैसे गांवों के लोग लगातार ब्लाक मुख्यालय पर डटे हुए हैं। ठंड बढ़ती जा रही है, रातें और सर्द हो रही हैं, लेकिन आंदोलनकारियों के इरादों में कोई ढील नहीं आई है। बुजुर्ग हों या युवा, महिलाएं हों या किसान, हर कोई अपनी मांगों को लेकर एकजुट है।
आंदोलन के मुद्दे क्या हैं ? इस आंदोलन का सबसे बड़ा मुद्दा है क्षेत्र में घूम रहे सैकड़ों बेसहारा गाय और बैल। चौकोट क्षेत्र के गांवों में इन पशुओं की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। खेतों में खड़ी फसलें रातों रात बर्बाद हो जाती हैं। किसान सुबह खेतों में पहुंचते हैं तो मेहनत की कमाई उजड़ी मिलती है। कई जगह सड़कों पर बैठे या अचानक सामने आ जाने वाले पशुओं की वजह से दुर्घटनाएं भी हो चुकी हैं। लोगों का कहना है कि यह केवल खेती का नुकसान नहीं, बल्कि जान का खतरा भी बन गया है।

गौ-संरक्षण का बजट कौन ‘डकार’ रहा ? आंदोलनकारी मांग कर रहे हैं कि इन बेसहारा पशुओं को सरकारी गौसदनों में भेजा जाए। सरकार गौ सदनों के लिए बजट जारी करती है, लेकिन अधिकारी उसको खुद खा जाते हैं। उनका कहना है कि जब बीजेपी सरकार गोवंश संरक्षण की बात करती है, तो फिर गांवों में उन्हें बेसहारा छोड़ देना किस तरह का संरक्षण है। किसान पूछ रहे हैं कि आखिर उनकी फसल की भरपाई कौन करेगा और उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा। बेसहारा पशुओं के साथ साथ क्षेत्र की सड़कों की हालत भी आंदोलन की बड़ी वजह है। डोटियाल चंपानगर जैसी कई सड़कें वर्षों से बदहाल हैं। गड्ढों से भरी इन सड़कों पर चलना किसी चुनौती से कम नहीं। बरसात में हालात और खराब हो जाते हैं। एंबुलेंस हो या स्कूल जाने वाले बच्चे, सभी को परेशानी उठानी पड़ती है। लोगों का कहना है कि सड़क चौड़ीकरण और डामरीकरण के नाम पर सिर्फ कागजी बातें होती हैं, जमीन पर काम दिखाई नहीं देता।
क्यों नहीं सुनते अधिकारी ? आंदोलनकारियों का आरोप है कि प्रशासन की कार्रवाई बेहद धीमी है। कई बार ज्ञापन दिए गए, अधिकारियों से मुलाकात हुई, लेकिन ठोस समाधान नहीं निकला। यही वजह है कि लोगों को आमरण अनशन जैसे कठोर कदम उठाने पड़े। नरेंद्र सिंह रावत सहित कई स्थानीय नेता आमरण अनशन पर बैठे, जबकि अन्य लोग क्रमिक अनशन के जरिए आंदोलन को मजबूती देते रहे। पिछले शनिवार को आंदोलन ने एक अलग ही रूप ले लिया, जब मातृशक्ति ने मोर्चा संभाला। बाजार और गांवों में घूम रहे बेसहारा गाय बैलों को हांकते हुए महिलाएं जुलूस के रूप में तहसील तक पहुंचीं। यह दृश्य अपने आप में प्रशासन के लिए एक बड़ा संदेश था। महिलाओं का कहना था कि जब घर परिवार और खेती दोनों की जिम्मेदारी उन्हीं पर है, तो नुकसान भी वही झेल रही हैं। ऐसे में चुप रहना अब संभव नहीं है। रविवार को आंदोलन को समर्थन देने राज्य आंदोलनकारी प्रयाग शर्मा भी स्याल्दे पहुंचे। उन्होंने आंदोलनकारियों के बीच बैठकर उनकी बातें सुनीं और कहा कि यह आंदोलन पूरी तरह जायज है। उनका कहना था कि उत्तराखंड राज्य इसी तरह के आंदोलनों से बना है और अगर आज भी जनता की बुनियादी समस्याएं नहीं सुनी जा रही हैं, तो संघर्ष करना मजबूरी बन जाता है। आंदोलन का स्वरूप समय के साथ और मजबूत हुआ है। धरना, अनशन, नारेबाजी के साथ साथ प्रशासन को बंद और चक्का जाम की चेतावनी भी दी जा चुकी है। दो दिसंबर को बड़े आंदोलन की चेतावनी ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी थी। हालांकि लोग अब भी बातचीत के जरिए समाधान की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

टूटती उम्मीदों की आवाज़ इस पूरे आंदोलन में एक बात साफ नजर आती है, यह केवल मांगों की सूची नहीं है, बल्कि यह पहाड़ के लोगों की टूटती उम्मीदों और फिर से उठती आवाज की कहानी है। चौकोट क्षेत्र के लोग कहते हैं कि वे विकास के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन विकास का मतलब केवल घोषणाएं नहीं होता। सड़क, सुरक्षा, खेती और जीवन की बुनियादी जरूरतें पूरी होना भी विकास का हिस्सा हैं। स्याल्दे आंदोलन यह भी दिखाता है कि पहाड़ के लोग आज भी संगठित होकर अपनी बात कह सकते हैं। यह आंदोलन किसी राजनीतिक दल के झंडे तले नहीं, बल्कि अपने हक के लिए लड़ा जा रहा है। यही वजह है कि इसमें हर वर्ग का समर्थन दिखाई देता है।
आंदोलन के पीछे का दर्द प्रशासन के सामने अब चुनौती है कि वह इस आंदोलन को केवल कानून व्यवस्था का मामला न समझे, बल्कि इसके पीछे छिपे दर्द को समझे। बेसहारा पशुओं की समस्या, खराब सड़कें और मूलभूत सुविधाओं की कमी लंबे समय से चली आ रही हैं। अगर समय रहते समाधान नहीं निकला, तो यह आंदोलन आने वाले दिनों में और बड़ा रूप ले सकता है। आज स्याल्दे की पहाड़ियों में जलती अलाव की आग केवल ठंड से बचने के लिए नहीं है, बल्कि यह उस उम्मीद की आग है कि शायद अब उनकी आवाज सुनी जाएगी। आंदोलनकारी कहते हैं कि वे थकेंगे नहीं, क्योंकि यह लड़ाई सिर्फ आज की नहीं, आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की है। संक्षेप में कहें तो स्याल्दे आंदोलन केवल एक क्षेत्र का आंदोलन नहीं, बल्कि यह पहाड़ के उस दर्द की तस्वीर है जो अक्सर फाइलों में दब जाता है। यह आंदोलन याद दिलाता है कि विकास की असली कसौटी वही होती है, जहां आखिरी गांव के आखिरी व्यक्ति की समस्या सुनी जाए। अब देखना यह है कि सरकार और प्रशासन इस आवाज को कब और कैसे सुनते हैं।






