Chamoli: पहाड़ी इलाकों में अब भालू का आतंक होगा ख़तम
चमोली- पहाड़ों में भालू की बढ़ती दहशत के बीच एक नया प्रयोग किया गया है। इस प्रयोग से अब भालू आबादी वाले इलाकों की ओर आने से बचेगा। इसके लिए चमोली जिला पंचायत ने डेंजर नाम की दवाई का इस्तेमाल शुरू किया है, जिसकी तेज गंध से भालू रास्ता बदल लेता है। यह प्रयोग पहले कुछ गांवों में किया जा रहा है और शुरुआती नतीजों के आधार पर आगे का फैसला लिया जाएगा। चमोली में पिछले कुछ समय से भालू का खतरा लगातार बढ़ा है। नगर से लेकर दूर दराज के गांवों तक लोग डर के साए में जी रहे हैं। बदरीनाथ और केदारनाथ वन प्रभाग क्षेत्र में भालू अब तक चार लोगों की जान ले चुका है। करीब चौबीस लोग घायल हुए हैं और सौ से ज्यादा मवेशी भी भालू का शिकार बन चुके हैं। इन घटनाओं ने गांवों में डर का माहौल बना दिया है।
हालत यह है कि शाम ढलते ही लोग घरों के दरवाजे बंद कर लेते हैं और बच्चों व बुजुर्गों को बाहर निकलने से रोक दिया जाता है। इसलिए अब दवाई का प्रयोग करने का फैसला किया गया। यह दवाई तरल रूप में भी है और दानेदार गोली के रूप में भी उपलब्ध है। इसकी खासियत यह है कि इसमें बहुत तेज गंध होती है, जो भालू को पसंद नहीं आती। जब इस दवाई का छिड़काव गांव की सीमा, खेतों के किनारे और आम रास्तों पर किया जाता है, तो भालू उस इलाके से दूर रहने लगता है। अधिकारियों का मानना है कि यह तरीका भालू को नुकसान पहुंचाए बिना लोगों की सुरक्षा में मदद करेगा। जिला पंचायत ने पहले भी भालू से बचाव के लिए कई कदम उठाए थे। ग्रामीण रास्तों और पैदल पगडंडियों के किनारे उगी झाड़ियों की कटाई कराई गई, ताकि भालू को छिपने की जगह न मिले। इसके बावजूद घटनाओं में कमी नहीं आई। इसके बाद जिला पंचायत ने एक अलग तरीका अपनाने का फैसला किया और डेंजर नाम की दवाई का प्रयोग शुरू किया। जिला पंचायत अध्यक्ष दौलत सिंह बिष्ट ने नंदानगर विकास खंड की दस ग्राम पंचायतों में इस दवाई और छिड़काव मशीनों का वितरण किया है। यह काम फिलहाल पायलट प्रोजेक्ट के रूप में किया जा रहा है। अगर इन गांवों में भालू की आवाजाही कम होती है और लोगों को राहत मिलती है, तो पूरे जिले के गांवों में यह दवाई बांटी जाएगी। जिला पंचायत ने दवाई के साथ साथ इसके छिड़काव के लिए साठ मशीनें भी खरीदी हैं।

इन मशीनों की मदद से ग्रामीण आसानी से रास्तों और सीमाओं पर दवाई का छिड़काव कर सकेंगे। अपर मुख्य अधिकारी तेज सिंह ने बताया कि दवाई की गंध इतनी तीखी होती है कि भालू उस दिशा में बढ़ने से पहले ही मुड़ जाता है। उन्होंने कहा कि अगर ट्रायल सफल रहा, तो यह तरीका जिले के हर प्रभावित गांव तक पहुंचाया जाएगा। विकास भवन परिसर में मुख्य विकास अधिकारी डॉ. अभिषेक त्रिपाठी ने खुद ग्रामीणों को डेंजर दवाई के पैकेट बांटे। उन्होंने कहा कि जिले के कई गांव जंगली जानवरों की समस्या से परेशान हैं और यह पहल किसानों और ग्रामीणों के लिए मददगार साबित हो सकती है। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि दवाई के सही इस्तेमाल को लेकर गांवों में लोगों को पूरी जानकारी दी जाए, ताकि कोई गलती न हो और इसका पूरा लाभ मिल सके। ग्रामीणों में इस नई पहल को लेकर उम्मीद जगी है।

कई लोगों का कहना है कि अगर भालू गांव के पास आना कम कर देगा, तो वे बिना डर के अपने खेतों और घरों के आसपास काम कर पाएंगे। बच्चों का स्कूल जाना आसान होगा और बुजुर्ग भी शाम के समय बाहर बैठ सकेंगे। हालांकि कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि इसे लंबे समय तक आजमाना जरूरी है, ताकि साफ हो सके कि यह तरीका कितना असरदार है। वन विभाग और जिला प्रशासन का कहना है कि यह प्रयोग किसी जानवर को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं है। इसका मकसद सिर्फ इतना है कि भालू और इंसान के बीच टकराव कम हो। साथ ही लोगों को यह भी समझाया जा रहा है कि दवाई के साथ साथ सफाई, रोशनी और सतर्कता भी जरूरी है। रात के समय अकेले बाहर न निकलना, कूड़ा खुले में न फेंकना और खेतों के पास रोशनी की व्यवस्था करना भी भालू को दूर रखने में मदद कर सकता है। कुल मिलाकर चमोली में भालू की दहशत से जूझ रहे लोगों के लिए यह प्रयोग एक नई उम्मीद लेकर आया है। अब सबकी नजर इस पायलट प्रोजेक्ट के नतीजों पर टिकी है। अगर यह तरीका कारगर साबित हुआ, तो जिले के हजारों ग्रामीणों को डर से राहत मिल सकती है और इंसान व जंगल के बीच संतुलन बनाए रखने में यह एक अहम कदम साबित होगा।






