Dehradun: उत्तराखण्ड में ऊर्जा निगम आयोग के निशाने परत्तराखण्ड में बिजली दरों का झटका तय? बढ़ते बिलों पर आयोग सख़्त, ऊर्जा निगमों से जवाब तलब
देहरादून- उत्तराखंड में बिजली की दरों को लेकर एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। प्रदेश के तीनों ऊर्जा निगमों यूपीसीएल, यूजेवीएनएल और पिटकुल की ओर से भेजे गए टैरिफ प्रस्तावों में कुछ कमियां पाई गई हैं। इन कमियों को देखते हुए उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग ने तीनों निगमों से जवाब मांगा है। आयोग का कहना है कि जब तक सभी जानकारियां साफ नहीं होंगी, तब तक आगे की प्रक्रिया पूरी नहीं की जा सकती।
इस बार ऊर्जा निगमों ने जो प्रस्ताव भेजा है, उसमें बिजली दरों में करीब अठारह दशमलव पांच प्रतिशत तक बढ़ोतरी की बात कही गई है। यह प्रस्ताव सामने आते ही आम लोगों में चिंता बढ़ गई है। महंगाई के दौर में बिजली का बिल बढ़ने का मतलब सीधे घर के बजट पर असर पड़ना है। खासकर मध्यम वर्ग और छोटे कारोबारियों के लिए यह एक बड़ी परेशानी बन सकती है।
नियामक आयोग के अधिकारियों ने तीनों निगमों के प्रस्तावों का बारीकी से अध्ययन किया। जांच के दौरान कुछ ऐसे बिंदु सामने आए, जिन पर जानकारी साफ नहीं थी या आंकड़ों में मेल नहीं बैठ रहा था। इसी वजह से आयोग ने पत्र लिखकर ऊर्जा निगमों से जवाब मांगा है। आयोग ने साफ कहा है कि सभी सवालों के जवाब सत्रह दिसंबर तक देने होंगे।
जब निगमों की ओर से जवाब आ जाएंगे और सारी स्थिति साफ हो जाएगी, उसके बाद टैरिफ से जुड़ी याचिकाएं औपचारिक रूप से दायर की जाएंगी। इसके बाद फरवरी महीने में नियामक आयोग इन प्रस्तावों पर जनसुनवाई करेगा। जनसुनवाई में आम उपभोक्ता, सामाजिक संगठन, उद्योग जगत और अन्य हितधारक अपनी राय और आपत्तियां रख सकेंगे।
जनसुनवाई के बाद आयोग सभी सुझावों और आपत्तियों का विश्लेषण करेगा। इसके बाद नए वित्तीय वर्ष दो हजार छब्बीस सत्ताईस के लिए अंतिम बिजली दरें तय की जाएंगी। आयोग ने साफ किया है कि नई दरें एक अप्रैल से लागू होंगी। यानी अभी अंतिम फैसला आना बाकी है, लेकिन संकेत यही हैं कि आने वाले समय में बिजली महंगी हो सकती है।
इस पूरे मामले में एक और बात चर्चा का विषय बनी हुई है। उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड ने इस बार पहली बार ऋणात्मक टैरिफ प्रस्ताव दिया है। इसका सीधा मतलब यह है कि यूजेवीएनएल ने अपने प्रस्ताव में किसी तरह की बढ़ोतरी नहीं मांगी है। यह बात नियामक आयोग के अधिकारियों के लिए भी चौंकाने वाली रही है।
ऋणात्मक टैरिफ का अर्थ यह होता है कि निगम को अपनी लागत या नुकसान की भरपाई के लिए उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ डालने की जरूरत नहीं है। हालांकि आयोग अब यह समझने की कोशिश कर रहा है कि यूजेवीएनएल ने ऐसा प्रस्ताव किन आधारों पर दिया है। क्या यह अस्थायी स्थिति है या फिर वास्तव में निगम की आर्थिक हालत ऐसी है कि उसे बढ़ोतरी की जरूरत नहीं है, इस पर मंथन किया जा रहा है।

बिजली दरों को लेकर हर साल यही स्थिति बनती है। ऊर्जा निगम अपने खर्च और नुकसान का हवाला देकर बढ़ोतरी की मांग करते हैं, जबकि आम उपभोक्ता बढ़ते बिलों से परेशान रहता है। पहाड़ी राज्य होने की वजह से उत्तराखंड में बिजली आपूर्ति और रखरखाव की लागत पहले से ही ज्यादा बताई जाती है। लेकिन आम लोगों का सवाल यह है कि क्या हर बार इसका बोझ सिर्फ उपभोक्ताओं पर ही डालना जरूरी है।
ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग कहते हैं कि बिजली पहले ही नियमित नहीं मिलती और अब अगर दरें बढ़ेंगी तो परेशानी और बढ़ेगी। छोटे दुकानदार और कारीगर भी यही चिंता जता रहे हैं कि बिजली महंगी होने से उनका काम प्रभावित होगा। दूसरी ओर ऊर्जा निगमों का कहना है कि बिना दरें बढ़ाए सिस्टम को सुचारू रखना मुश्किल होता जा रहा है।
अब सबकी नजर नियामक आयोग की प्रक्रिया पर टिकी है। जनसुनवाई में लोगों की बात कितनी सुनी जाती है और अंतिम फैसला क्या निकलता है, यह आने वाले महीनों में साफ होगा। फिलहाल इतना तय है कि एक अप्रैल से पहले बिजली की दरों को लेकर तस्वीर पूरी तरह साफ हो जाएगी और उसी के बाद प्रदेश के लोगों को यह पता चलेगा कि उनके बिजली बिल में कितना बदलाव होने वाला है।






