Snake Menace – भालू-गुलदार नहीं पहाड़ों में सांप बनते जा रहे हैं बड़ा ख़तरा, 50 दिन में 13 की मौत
देहरादून – उत्तराखंड में अब सिर्फ भालू और गुलदार ही नहीं, बल्कि जहरीले सांप भी इंसानों के लिए बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। बदलते मौसम और बढ़ते तापमान ने वन्यजीवों के व्यवहार को बदल दिया है और इसका सीधा असर इंसानी जान पर पड़ रहा है। हालात यह हैं कि सर्दियों के मौसम में भी सांप सक्रिय दिख रहे हैं और जानलेवा घटनाएं सामने आ रही हैं। अब तक उत्तराखंड में वन्यजीव हमलों की बात होती थी तो चर्चा भालू और गुलदार तक ही सीमित रहती थी। लेकिन हाल के आंकड़ों ने एक और डरावनी तस्वीर सामने रख दी है। पिछले करीब 50 दिनों में राज्य में सांप के काटने से 13 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 23 लोग गंभीर हालत में अस्पताल पहुंचे हैं। यह खतरा किसी एक जिले या इलाके तक सीमित नहीं है, बल्कि पहाड़ से लेकर मैदानी क्षेत्रों तक फैल चुका है। वन विभाग का मानना है कि इसके पीछे जलवायु परिवर्तन बड़ी वजह है। पहले सर्दियों के दौरान भालू, सांप और कई अन्य वन्यजीव शीतनिंद्रा में चले जाते थे। इस दौरान उनकी गतिविधियां कम हो जाती थीं और हमलों की घटनाएं भी घट जाती थीं। लेकिन इस बार सर्दियों में भी तापमान सामान्य से ज्यादा रहा। इसका नतीजा यह हुआ कि न तो भालुओं की शीतनिंद्रा पूरी हो पाई और न ही सांपों की सक्रियता कम हुई। उत्तराखंड के वन मंत्री सुबोध उनियाल ने इस स्थिति को बेहद चिंताजनक बताया है। उन्होंने कहा कि भालू, गुलदार और अब सांपों के व्यवहार में आ रहे बदलाव को हल्के में नहीं लिया जा सकता। सरकार इस बात पर गंभीरता से विचार कर रही है कि इन बदलावों का वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाए, ताकि सही कारण सामने आ सकें और भविष्य में जानमाल का नुकसान कम किया जा सके।

वन मंत्री ने बताया कि इसके लिए वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से अध्ययन कराने पर विचार किया जा रहा है। इस अध्ययन का मकसद यह समझना होगा कि आखिर क्यों वन्यजीव अपने पुराने व्यवहार से हटकर अब इंसानी बस्तियों के ज्यादा करीब आ रहे हैं। अगर समय रहते कारणों को नहीं समझा गया, तो आने वाले वर्षों में यह खतरा और बढ़ सकता है। जहरीले सांप अब गांवों और शहरों के आसपास ज्यादा नजर आने लगे हैं। देहरादून और उसके आसपास के इलाकों से लगातार सांपों के दिखने की खबरें मिल रही हैं। ऐसे मामलों में वन विभाग की क्विक रिस्पॉन्स टीम को तुरंत मौके पर भेजा जाता है। इन टीमों को खास ट्रेनिंग दी गई है और जरूरी उपकरण भी मुहैया कराए गए हैं, ताकि सांपों का सुरक्षित तरीके से रेस्क्यू किया जा सके। देहरादून के प्रभागीय वनाधिकारी नीरज शर्मा का कहना है कि जहरीले सांपों के मामलों को देखते हुए टीमों को एंटी वेनम के साथ भेजा जाता है। उन्होंने बताया कि किसी भी अनहोनी से निपटने के लिए अस्पतालों और रेस्क्यू टीमों के बीच तालमेल रखा जा रहा है, ताकि समय पर इलाज मिल सके और जान बचाई जा सके। अगर लंबे समय के आंकड़ों पर नजर डालें, तो खतरे की गंभीरता और साफ हो जाती है। उत्तराखंड वन विभाग के अनुसार साल 2013 से अब तक करीब 13 वर्षों में सांप के काटने से 274 लोगों की मौत हो चुकी है। इसी अवधि में 1073 लोग सांप के जहर से घायल हुए हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि सांप पहले भी घातक थे, लेकिन इस बार स्थिति इसलिए ज्यादा गंभीर है क्योंकि सर्दियों में भी मौत के मामले सामने आ रहे हैं। तुलना करें तो गुलदार से होने वाली मौतों की संख्या ज्यादा दिखाई देती है, लेकिन वह आंकड़ा करीब 25 वर्षों का है। वहीं सांपों ने सिर्फ 13 वर्षों में ही गुलदार के मुकाबले लगभग आधा नुकसान पहुंचा दिया है। औसत के हिसाब से देखें तो इस समय सांप इंसानों के लिए सबसे लगातार और बड़ा खतरा बन चुके हैं। ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग सबसे ज्यादा डरे हुए हैं। खेतों में काम करते समय, घरों के आसपास और यहां तक कि कमरों के भीतर भी सांप मिलने की घटनाएं बढ़ रही हैं। लोगों का कहना है कि पहले सर्दियों में सांपों का डर कम रहता था, लेकिन अब हर मौसम में सतर्क रहना पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ वन विभाग या सरकार की समस्या नहीं है। जलवायु परिवर्तन का असर अब साफ दिखने लगा है और इसके लिए समाज को भी जागरूक होना पड़ेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को यह जानकारी देना जरूरी है कि सांप दिखने पर क्या करें, कैसे सुरक्षित रहें और तुरंत किससे संपर्क करें।
अब तक जलवायु परिवर्तन के असर की चर्चा भालू और गुलदार के संदर्भ में होती रही, लेकिन हालिया घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि सांप भी उतने ही घातक हैं। उनके व्यवहार में आ रहा बदलाव आने वाले समय के लिए खतरे की घंटी है। अगर समय रहते वैज्ञानिक अध्ययन, जागरूकता और मजबूत व्यवस्था नहीं की गई, तो इंसान और वन्यजीवों के बीच टकराव और बढ़ सकता है। फिलहाल सरकार और वन विभाग सतर्क हैं, लेकिन यह साफ है कि बदलते मौसम के साथ खतरे का स्वरूप भी बदल रहा है। ऐसे में सिर्फ तात्कालिक कदम नहीं, बल्कि लंबे समय की ठोस योजना की जरूरत है, ताकि लोगों की जान बचाई जा सके और इंसान तथा प्रकृति के बीच संतुलन बना रहे।






