Uttarakhand Sarkar Yojna – पहाड़ की महिला पशुपालकों नहीं मिल पा रहा चारा, सरकार की योजना में लग गई ‘जंग’
देहरादून: उत्तराखंड में पशुपालकों और खासतौर पर पहाड़ की महिलाओं की मुश्किलें एक बार फिर बढ़ती दिख रही हैं। राज्य सरकार की घसियारी कल्याण योजना, जिससे महिलाओं को पशुओं के लिए घास काटने के भारी बोझ से राहत मिलनी थी, वह कई इलाकों में फिर से अटक गई है। इस योजना के तहत घर बैठे पशुओं के लिए चारा और साइलेज मिलने की व्यवस्था की गई थी, ताकि महिलाओं को जंगलों और दूर के इलाकों में घास काटने के लिए न जाना पड़े। लेकिन जमीनी हालात यह हैं कि कई पर्वतीय गांवों में लंबे समय से चारा नहीं पहुंच रहा है। घसियारी कल्याण योजना की शुरुआत वर्ष 2023 में बड़े मकसद के साथ की गई थी। सरकार का कहना था कि इससे पहाड़ की महिलाओं का समय बचेगा, उनकी सेहत सुधरेगी और वन्यजीवों के खतरे से भी उन्हें राहत मिलेगी। पहाड़ों में आज भी अधिकतर महिलाएं सुबह अंधेरे में घास काटने जंगल जाती हैं, कई किलोमीटर पैदल चलती हैं और भारी गट्ठर सिर पर ढोकर घर लाती हैं। इसी मेहनत को कम करने के लिए यह योजना लाई गई थी। लेकिन योजना शुरू होने के बाद से ही इसमें लगातार दिक्कतें आती रही हैं। अब एक बार फिर पशुपालक परेशान हैं। कई गांवों के लोगों का कहना है कि महीनों से उनके क्षेत्र में साइलेज और पशु आहार नहीं पहुंचा है। मजबूरी में उन्हें या तो बाजार से महंगे दामों पर चारा खरीदना पड़ रहा है या फिर जंगलों पर निर्भर होना पड़ रहा है। पशुपालकों की परेशानी इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि वन विभाग लगातार लोगों से अपील कर रहा है कि वे अपने मवेशियों को जंगल में चरने के लिए न छोड़ें। विभाग का कहना है कि जंगलों में गुलदार और अन्य जंगली जानवरों का खतरा बढ़ गया है। बीते कुछ समय में महिलाओं पर वन्यजीवों के हमले की घटनाएं सामने आई हैं, जिससे डर का माहौल बना हुआ है। ऐसे में महिलाएं न जंगल जा पा रही हैं और न ही घर तक चारा पहुंच रहा है। कई पशुपालकों का कहना है कि वे दोहरी मार झेल रहे हैं। एक तरफ जंगल जाने पर जान का खतरा है और दूसरी तरफ घर पर चारे की व्यवस्था नहीं है। छोटे पशुपालक, जिनके पास दो या तीन गाय भैंस हैं, उनके लिए यह समस्या और भी गंभीर हो गई है क्योंकि उनकी आमदनी सीमित होती है। घसियारी योजना के तहत चारे की आपूर्ति रुकने की सबसे बड़ी वजह बजट की कमी बताई जा रही है। योजना के तहत साइलेज सप्लाई की जिम्मेदारी एक निजी संस्था को दी गई थी।

समय पर भुगतान न होने के कारण उस संस्था ने चारा भेजना बंद कर दिया। इसका सीधा असर पर्वतीय जिलों के पशुपालकों पर पड़ा। आंकड़ों के मुताबिक उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में हर महीने करीब तीन हजार टन साइलेज की जरूरत होती है। योजना के शुरुआती दौर में यह सप्लाई नियमित हो रही थी, लेकिन बजट अटकने के बाद व्यवस्था बिगड़ गई। अब सरकार ने बड़े डेयरी फार्मरों के लिए कुछ नई शर्तें भी लागू कर दी हैं। इसके तहत केवल पांच पशुओं तक रखने वाले पशुपालकों को ही सब्सिडी के तहत चारा मिलेगा। इससे ज्यादा पशु रखने वालों को तय मात्रा से अधिक चारे के लिए बाजार दर पर भुगतान करना होगा। इस बदलाव से भी कई पशुपालक नाराज हैं। उनका कहना है कि पहाड़ों में पशुपालन पहले से ही घाटे का सौदा बनता जा रहा है। चारा महंगा होगा तो दूध उत्पादन और भी मुश्किल हो जाएगा। पशुपालकों की शिकायतों के बीच सहकारिता विभाग ने राहत की बात कही है। विभाग का कहना है कि अब योजना के लिए बजट जारी कर दिया गया है और जल्द ही चारा आपूर्ति फिर से शुरू की जाएगी। सहकारिता विभाग के डिप्टी रजिस्ट्रार आनंद शुक्ला के अनुसार, भुगतान न होने की वजह से वेंडर ने सप्लाई रोकी थी, लेकिन अब बजट मिलने के बाद व्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाया जा रहा है। विभाग का दावा है कि आने वाले दिनों में पर्वतीय क्षेत्रों में चारा पहुंचना शुरू हो जाएगा और पशुपालकों को राहत मिलेगी। हालांकि गांवों में रहने वाले लोग अभी भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं। उनका कहना है कि जब तक चारा जमीन पर नहीं पहुंचता, तब तक भरोसा करना मुश्किल है। घसियारी कल्याण योजना पहाड़ की महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण मानी जा रही थी। अगर यह योजना ठीक से चले, तो महिलाओं को जंगल जाने से राहत मिलेगी, उनका समय बचेगा और पशुपालन भी सुरक्षित तरीके से हो सकेगा। अब देखना यह है कि सरकार अपने दावों पर कितनी जल्दी अमल करती है और क्या सच में पहाड़ की महिलाओं और पशुपालकों की मुश्किलें कम हो पाती हैं या नहीं।






