फरीदाबाद मॉड्यूल की जांच में खुलासा: जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद फिर भड़काने की बड़ी साजिश बेनकाब
नई दिल्ली। फरीदाबाद मॉड्यूल की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, सुरक्षा एजेंसियों के सामने लगातार नए और चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। शुरुआत में माना जा रहा था कि यह गिरोह सिर्फ दिल्ली और आसपास धमाके की साजिश रच रहा था, लेकिन अब पता चला है कि इनके इरादे इससे कहीं बड़े थे। ये आरोपी जम्मू-कश्मीर में फिर से अलगाववाद की आग भड़काना चाहते थे—वही अलगाववाद, जिसने बरसों घाटी को दहशत, हिंसा और अस्थिरता के अंधेरे में धकेले रखा था।
एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, अनुच्छेद 370 हटने के बाद कश्मीर में अलगाववादी नेटवर्क लगभग खत्म हो गया था। इसकी वजह थी केंद्र सरकार की लगातार कार्रवाई—एक ओर विकास और मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास, तो दूसरी ओर अलगाववादी नेताओं पर प्रवर्तन, मनी लॉन्ड्रिंग और अन्य मामलों में सख्त कार्रवाई। इससे वह पूरी machinery ध्वस्त हो गई, जो युवाओं को भड़काकर हथियार उठाने के लिए तैयार करती थी। पाकिस्तान कोशिश तो करता रहा कि घाटी में आतंकवाद बना रहे, लेकिन उसे समझ आ गया कि सिर्फ आतंकियों को भेजना काफी नहीं होगा; अलगाववाद फैलाने वाले चेहरे भी जरूरी हैं।
इसी कारण भारतीय एजेंसियां सिर्फ आतंकियों पर नहीं, बल्कि अलगाववादी विचारधारा के प्रचार को भी रोकने पर बराबर ध्यान दे रही हैं। जांच में शामिल एक अधिकारी ने बताया कि इस मॉड्यूल के सदस्य घाटी में फिर से अलगाववाद का आधार खड़ा करने के मिशन पर काम कर रहे थे। जिन जगहों पर जम्मू-कश्मीर में छापेमारी हुई, वहां से प्रतिबंधित संगठनों के पर्चे, पोस्टर और साहित्य बरामद किया गया। इससे साफ है कि यह कोई छोटी-मोटी हरकत नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर तैयारी थी।
इस साजिश का मुख्य सूत्रधार मुफ्ती इरफान अहमद बताया जा रहा है। पूछताछ में उसने स्वीकार किया कि वे फिर से अलगाववाद को हवा देने की कोशिश कर रहे थे। पुलिस को उसके पास से बरामद सामग्री भी इस प्लान की पुष्टि करती है। उनका असली लक्ष्य कश्मीर को 2019 से पहले की स्थिति में वापस ले जाना था—जहां अलगाववादी नेता खुलेआम घूमते, युवाओं को भड़काते और मस्जिदों से निकलने वाली भीड़ को पत्थरबाजी के लिए उकसाते थे।
जैसे ही अलगाववादी नेटवर्क ढहा, घाटी में आतंकी संगठनों के लिए भर्ती भी लगभग समाप्त हो गई। पहले जैश, लश्कर और हिजबुल जैसे गुटों में हर महीने दर्जनों युवा शामिल होते थे, लेकिन अब संख्या बहुत कम रह गई है। वजह साफ है—अब कोई नहीं जो युवाओं को बहकाए या पाकिस्तान के इशारे पर उन्हें इस्तेमाल करे।
आईबी के एक अधिकारी के मुताबिक, अलगाववाद खत्म होने का मतलब है कि वह जहरीली विचारधारा कमजोर पड़ गई, जो युवाओं को हिंसा की राह पर धकेलती थी। सरकार लगातार यह संदेश दे रही है कि कश्मीर का युवा शिक्षा, व्यापार, खेल और पर्यटन में आगे बढ़े। हाल के वर्षों में विकास योजनाओं और सुरक्षा में सुधार ने पर्यटन को भी नई रफ्तार दी है। हालांकि पहलगाम हमले से पाकिस्तान ने माहौल बिगाड़ने की कोशिश की थी, पर उसका प्रभाव ज्यादा देर नहीं टिक पाया।
जांच में यह भी सामने आया कि इस मॉड्यूल ने अलगाववादी सोच फैलाने के लिए पूरा अभियान पहले से ही तैयार कर रखा था। पोस्टर, पर्चे, बैनर—सब कुछ छपकर तैयार था। योजना थी कि इन्हें बड़े पैमाने पर बांटकर युवाओं को भड़काया जाए और घाटी में फिर तनाव पैदा किया जाए।
रविवार को पुलवामा में हुई छापेमारी में पुलिस को प्रतिबंधित संगठनों का साहित्य और अलगाववादी सामग्री मिली, जिससे यह साफ हो गया कि यह मॉड्यूल सिर्फ धमाकों की साजिश में नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर को फिर से अशांति की ओर धकेलने की बड़ी योजना पर काम कर रहा था।






