Amnesia at a young age – अगर आपको भी कम उम्र में भूलने की बीमारी हो गई है तो ये 5 बातें ज़रूर याद रखना
घर से बाहर निकलते समय याद न रहना कि क्या काम था। मोबाइल हाथ में लेकर किसी का नंबर मिलाने जाना और अगले ही पल भूल जाना कि किसे फोन करना था। किसी परिचित से मिलने पर चेहरा तो पहचान में आ जाए, लेकिन नाम जुबान पर न आए। कुछ साल पहले तक ऐसी बातें सिर्फ बुजुर्गों से जुड़ी मानी जाती थीं, लेकिन अब यही समस्या कम उम्र के युवाओं में तेजी से दिख रही है। डॉक्टर इसे नई पीढ़ी की जीवनशैली से जुड़ी बड़ी चेतावनी मान रहे हैं। कम उम्र में बढ़ती भूलने की बीमारी अब सिर्फ व्यक्तिगत परेशानी नहीं रही, बल्कि परिवार और समाज दोनों को प्रभावित करने लगी है। देहरादून के राजकीय दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल और जिला अस्पताल की मनोरोग ओपीडी में हर दूसरा या तीसरा युवा इसी शिकायत के साथ पहुंच रहा है कि उसकी याददाश्त कमजोर हो रही है और किसी काम पर ध्यान लगाना मुश्किल हो गया है। भूलने की बीमारी के छोटे लेकिन परेशान करने वाले उदाहरण रवि 28 साल का है और एक निजी कंपनी में काम करता है। वह बताता है कि अक्सर मीटिंग के बीच जरूरी बातें भूल जाता है। घर से सब्जी लेने जाता है, लेकिन बाजार पहुंचकर याद ही नहीं आता कि क्या लेना था। दूसरी ओर 32 साल की नेहा कहती हैं कि वह बच्चों के स्कूल से जुड़े कामों को लेकर लगातार उलझन में रहती हैं। जरूरी फॉर्म भरना या समय पर फीस जमा करना याद नहीं रहता। ऐसी घटनाएं उन्हें अंदर से बेचैन कर देती हैं। डॉक्टरों का कहना है कि ये उदाहरण दिखाते हैं कि समस्या कितनी आम हो चुकी है और इसे हल्के में लेना ठीक नहीं है। क्यों बढ़ रही है कम उम्र में भूलने की समस्या मनोचिकित्सकों के अनुसार, कम उम्र में भूलने की बीमारी का सबसे बड़ा कारण तनाव है। आज का युवा एक साथ कई काम करना चाहता है। नौकरी, पढ़ाई, परिवार, सोशल मीडिया और निजी जिंदगी के दबाव के बीच दिमाग को आराम का समय नहीं मिल पाता। हर वक्त कुछ न कुछ सोचते रहने से दिमाग थक जाता है और नई जानकारी को ठीक से दर्ज नहीं कर पाता। इसके साथ ही मोबाइल और स्क्रीन टाइम भी बड़ी वजह बन रहा है। घंटों मोबाइल, लैपटॉप और टीवी देखने से दिमाग पर लगातार दबाव बना रहता है। इससे याददाश्त और ध्यान लगाने की क्षमता कमजोर होने लगती है। मल्टी टास्किंग से बढ़ रही परेशानी आजकल मल्टी टास्किंग को कामयाबी की पहचान मान लिया गया है। लोग एक साथ फोन पर बात करते हुए ईमेल लिखते हैं, सोशल मीडिया देखते हैं और काम की योजना बनाते हैं। डॉक्टर बताते हैं कि दिमाग एक समय में सीमित चीजें ही ठीक से संभाल सकता है। जब एक साथ कई काम किए जाते हैं तो दिमाग किसी एक बात को ठीक से दर्ज नहीं कर पाता। बाद में वही बात भूलने की परेशानी बन जाती है। पोषण की कमी भी जिम्मेदार खानपान में बदलाव भी याददाश्त पर असर डाल रहा है। फास्ट फूड, पैकेट वाला खाना और मीठे पेय ज्यादा लेने से शरीर को जरूरी पोषक तत्व नहीं मिल पाते। विटामिन बी, आयरन और ओमेगा थ्री फैटी एसिड की कमी दिमाग के काम करने की क्षमता को कमजोर करती है। डॉक्टर कहते हैं कि पोषण की कमी से दिमाग की नसों में तनाव बढ़ता है, जिससे भूलने की समस्या बढ़ती है। नींद की कमी और देर रात तक जागना कम उम्र में भूलने की बीमारी के पीछे नींद की कमी भी बड़ा कारण है। देर रात तक मोबाइल चलाना, ओटीटी प्लेटफॉर्म देखना या काम पूरा करने के लिए जागते रहना अब आम बात हो गई है। जब दिमाग को पूरी नींद नहीं मिलती, तो वह दिनभर ठीक से काम नहीं कर पाता। नींद के दौरान ही दिमाग दिनभर की जानकारी को सहेजता है। नींद कम होने पर यह प्रक्रिया बाधित हो जाती है। डिप्रेशन और चिंता की भूमिका मनोचिकित्सकों का कहना है कि डिप्रेशन और चिंता की समस्या भी याददाश्त को प्रभावित करती है। जब कोई व्यक्ति लगातार चिंता में रहता है या उदास रहता है, तो उसका ध्यान और एकाग्रता कम हो जाती है। ऐसे में दिमाग सामान्य तरह से काम नहीं कर पाता और छोटी छोटी बातें भी याद नहीं रहतीं। डिमेंशिया और सामान्य भूल में फर्क दून मेडिकल कॉलेज की मनोरोग विभागाध्यक्ष डॉक्टर जया नवानी बताती हैं कि असली डिमेंशिया आमतौर पर 60 या 65 साल की उम्र के बाद होता है। इसमें याददाश्त के साथ साथ रोजमर्रा के काम करने की क्षमता भी धीरे धीरे खत्म होने लगती है। कम उम्र में होने वाली भूल आमतौर पर डिमेंशिया नहीं होती, बल्कि ध्यान और एकाग्रता की कमी होती है। डॉक्टर बताती हैं कि दिमाग एक समय में पांच से सात चीजें ही ठीक से दर्ज कर सकता है। अगर किसी काम के दौरान दूसरी बात आ जाए, तो पहली बात दिमाग में दर्ज ही नहीं हो पाती। बाद में लगता है कि हम भूल गए, जबकि असल में दिमाग ने उस जानकारी को कभी ठीक से सहेजा ही नहीं। व्यवहार में आ रहा बदलाव कम उम्र में भूलने की समस्या का असर सिर्फ याददाश्त तक सीमित नहीं रहता। इससे स्वभाव और व्यवहार में भी बदलाव आने लगता है। लोग चिड़चिड़े हो जाते हैं, बातचीत में रुचि कम हो जाती है और आत्मविश्वास भी घटने लगता है। माता पिता और परिवार के लोग इस बदलाव से परेशान हो जाते हैं, क्योंकि उन्हें समझ नहीं आता कि युवा अचानक ऐसा व्यवहार क्यों करने लगा है। जिला अस्पताल के अनुभव वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉक्टर उषा मेहरा बताती हैं कि उनकी ओपीडी में हर महीने बड़ी संख्या में युवा भूलने की शिकायत लेकर आते हैं। इनमें से बहुत कम मामलों में असली डिमेंशिया होता है। ज्यादातर मामलों में कारण तनाव, चिंता, नींद की कमी और गलत जीवनशैली होती है। सही सलाह और जीवनशैली में बदलाव से ऐसे मरीजों की हालत में सुधार देखा गया है।

कब जरूरी है डॉक्टर से मिलना डॉक्टरों का कहना है कि अगर भूलने की समस्या रोजमर्रा के कामों को प्रभावित करने लगे, बार बार चीजें भूलने की वजह से काम या रिश्तों में परेशानी आने लगे, या साथ में चिड़चिड़ापन और उदासी बढ़ने लगे, तो डॉक्टर से मिलना जरूरी है। समय पर सलाह लेने से समस्या को बढ़ने से रोका जा सकता है।
समाधान क्या है ? डॉक्टर साफ कहते हैं कि कम उम्र में भूलने की बीमारी से बचने के लिए जीवनशैली में बदलाव जरूरी है। नियमित नींद, संतुलित भोजन, रोजाना कुछ समय शारीरिक गतिविधि और स्क्रीन टाइम कम करना बहुत जरूरी है। एक समय में एक काम करने की आदत डालनी चाहिए। मोबाइल से थोड़ी दूरी, किताब पढ़ने की आदत, ध्यान और योग जैसी गतिविधियां दिमाग को आराम देती हैं। साथ ही परिवार और दोस्तों के साथ बातचीत भी तनाव कम करने में मदद करती है।

नई पीढ़ी के लिए चेतावनी कम उम्र में भूलने की समस्या आने वाली पीढ़ी के लिए चेतावनी है। अगर आज ही जीवनशैली पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह परेशानी आगे चलकर गंभीर रूप ले सकती है। डॉक्टरों का मानना है कि सही समय पर जागरूकता और छोटे छोटे बदलाव युवाओं को इस समस्या से बचा सकते हैं। भूलना इंसानी स्वभाव है, लेकिन जब यह रोज की जिंदगी में परेशानी बनने लगे, तो इसे नजरअंदाज करना ठीक नहीं। दिमाग भी शरीर का हिस्सा है और उसे भी आराम, पोषण और ध्यान की जरूरत होती है।






