अल नीनो भी नहीं बिगाड़ सका मानसून का गणित! जुलाई में सामान्य बारिश ने मौसम वैज्ञानिकों और AI दोनों को चौंकाया
इस वर्ष भारतीय मानसून ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि प्रकृति को पूरी तरह समझ पाना आज भी विज्ञान के लिए आसान नहीं है। जून में देशभर में बेहद कम बारिश और तेजी से मजबूत होते अल नीनो के कारण मौसम विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया था कि जुलाई भी कमजोर रहेगा। भारतीय मौसम विभाग (IMD) से लेकर कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने सामान्य से कम वर्षा की संभावना जताई थी। लेकिन महीने के अंत तक तस्वीर पूरी तरह बदल गई और देश में जुलाई की बारिश सामान्य श्रेणी में पहुंच गई।
यह घटनाक्रम केवल मौसम विभाग के लिए ही नहीं, बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित आधुनिक मौसम मॉडल के लिए भी बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि बदलती जलवायु के दौर में केवल पारंपरिक मौसम संकेतों या AI पर निर्भर रहकर मानसून का सटीक पूर्वानुमान लगाना अब संभव नहीं रह गया है। इस वर्ष जून महीने में देशभर में लगभग 99.5 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई, जबकि सामान्य औसत 165.4 मिलीमीटर माना जाता है। यानी जून में करीब 40 प्रतिशत बारिश की कमी रही। यह स्थिति पिछले 125 वर्षों में सबसे शुष्क जून महीनों में शामिल रही।

कम वर्षा और अल नीनो की सक्रियता को देखते हुए मौसम विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया कि जुलाई में भी मानसून कमजोर रहेगा। भारतीय मौसम विभाग ने भी दीर्घकालिक औसत (LPA) के लगभग 94 प्रतिशत वर्षा का अनुमान जारी किया था। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने भी अल नीनो के प्रभाव को देखते हुए कमजोर मानसून की चेतावनी दी थी। लेकिन जुलाई के अंत तक बारिश ने सभी अनुमानों को गलत साबित कर दिया। कई क्षेत्रों में अच्छी वर्षा हुई और राष्ट्रीय स्तर पर कुल बारिश सामान्य श्रेणी में पहुंच गई।
विशेषज्ञों के अनुसार पहले अल नीनो का अर्थ लगभग निश्चित रूप से कमजोर मानसून माना जाता था। लेकिन अब जलवायु परिवर्तन के कारण यह संबंध पहले जैसा मजबूत नहीं रहा। धरती का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। गर्म वातावरण पहले की तुलना में अधिक मात्रा में जलवाष्प को अपने भीतर रोक सकता है। इसका परिणाम यह होता है कि लंबे समय तक सूखा रहने के बाद अचानक अत्यधिक वर्षा देखने को मिलती है। यही वजह है कि आज एक ही मानसून सीजन में कहीं बाढ़ जैसी स्थिति बनती है तो कहीं सूखे जैसे हालात बने रहते हैं।

वैज्ञानिकों का कहना है कि मानसून का पैटर्न पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल हो गया है और पुराने मौसमीय संकेत अब हर बार समान परिणाम नहीं देते। बदलते मौसम को समझने के लिए देश के कई प्रमुख वैज्ञानिक संस्थानों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अत्याधुनिक मॉडल विकसित किए हैं। इसी दिशा में आईआईटी मद्रास, गौहाटी विश्वविद्यालय और अन्य संस्थानों के शोधकर्ताओं ने ‘समुद्रऐस’ नामक एक त्रि-आयामी AI आधारित पृथ्वी तंत्र मॉडल तैयार किया।
इस मॉडल को लगभग 150 वर्षों के वैश्विक जलवायु आंकड़ों पर प्रशिक्षित किया गया। इसके बाद इससे सैकड़ों वर्षों के मौसमीय अनुकरण (Simulation) किए गए ताकि भविष्य के मौसम का अधिक सटीक अनुमान लगाया जा सके। हालांकि अध्ययन में सामने आया कि यह मॉडल भी भारतीय मानसून के वास्तविक व्यवहार को पूरी तरह नहीं समझ सका।

शोध के अनुसार वास्तविक भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून की वर्षा में जितना उतार-चढ़ाव देखा जाता है, AI मॉडल उसे लगभग 23 प्रतिशत कम आंकता है। इसके अलावा वास्तविक मानसून में लगभग 42 दिनों का सक्रिय चक्र पाया जाता है, लेकिन AI मॉडल इस चक्र की ताकत को आधे से भी कम दर्शा पाया। इसके स्थान पर उसने लगभग 60 दिनों का एक कृत्रिम चक्र अधिक प्रभावी दिखाया, जो वास्तविक परिस्थितियों से मेल नहीं खाता।
वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि AI मॉडल अल नीनो की तीव्रता का सही अनुमान लगाने में सफल नहीं रहा। प्रशांत महासागर के नीनो-3.4 क्षेत्र में समुद्री सतह के तापमान में जितना वास्तविक बदलाव दर्ज हुआ, मॉडल ने उससे काफी कम परिवर्तन दिखाया। इतना ही नहीं, मानसून और अल नीनो के बीच बनने वाले संबंध के समय का भी मॉडल सही अनुमान नहीं लगा पाया। इससे मौसमी पूर्वानुमान की सटीकता प्रभावित हो सकती है।

एक अन्य वैज्ञानिक अध्ययन में गूगल के AI आधारित मौसम पूर्वानुमान मॉडल GraphCast का भी मूल्यांकन किया गया। इसमें वर्ष 2021 से 2024 के मानसून मौसम के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया और मॉडल द्वारा दिए गए 24, 48 तथा 72 घंटे के पूर्वानुमानों की तुलना वास्तविक मौसम और उपग्रह आंकड़ों से की गई।
अध्ययन में पाया गया कि GraphCast सामान्य वर्षा के वितरण को तो अपेक्षाकृत बेहतर ढंग से दिखाता है, लेकिन अधिकांश क्षेत्रों में वास्तविकता से अधिक वर्षा का अनुमान लगाता है। दूसरी ओर, भारी और अत्यधिक वर्षा जैसी घटनाओं को कम दर्शाता है सबसे बड़ी कमी यह सामने आई कि मॉडल वर्षा के वास्तविक उतार-चढ़ाव को सही ढंग से नहीं पकड़ पाया। इसकी परिवर्तनशीलता क्षमता केवल 14 प्रतिशत रही, यानी वास्तविक वर्षा की विविधता का बहुत छोटा हिस्सा ही मॉडल सही ढंग से समझ सका।

एक अन्य वैज्ञानिक अध्ययन में गूगल के AI आधारित मौसम पूर्वानुमान मॉडल GraphCast का भी मूल्यांकन किया गया। इसमें वर्ष 2021 से 2024 के मानसून मौसम के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया और मॉडल द्वारा दिए गए 24, 48 तथा 72 घंटे के पूर्वानुमानों की तुलना वास्तविक मौसम और उपग्रह आंकड़ों से की गई।
अध्ययन में पाया गया कि GraphCast सामान्य वर्षा के वितरण को तो अपेक्षाकृत बेहतर ढंग से दिखाता है, लेकिन अधिकांश क्षेत्रों में वास्तविकता से अधिक वर्षा का अनुमान लगाता है। दूसरी ओर, भारी और अत्यधिक वर्षा जैसी घटनाओं को कम दर्शाता है। सबसे बड़ी कमी यह सामने आई कि मॉडल वर्षा के वास्तविक उतार-चढ़ाव को सही ढंग से नहीं पकड़ पाया। इसकी परिवर्तनशीलता क्षमता केवल 14 प्रतिशत रही, यानी वास्तविक वर्षा की विविधता का बहुत छोटा हिस्सा ही मॉडल सही ढंग से समझ सका।






