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बर्फबारी के बाद हैवी स्नोफॉल से प्रशासन अलर्ट, रैणी जैसे हादसे से बचने के लिए कैमरों से निगरानी

चमोली- गढ़वाल के पहाड़ी इलाकों में बर्फबारी और हिमस्खलन के कारण रैणी आपदा जैसा आपदा फिर न आए, इसके लिए प्रशासन इस बार अलर्ट है। पहाड़ी इलाकों में बर्फबारी बढ़ने से अब हिमस्खलन का खतरा बढ़ता जा रहा है। इसीलिए बढ़ती घटनाओं को देखते हुए अब सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया जा रहा है। रैणी आपदा जैसी किसी भी बड़ी त्रासदी की दोबारा पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए विष्णुप्रयाग जल विद्युत परियोजना से जुड़ी जेपी कंपनी ने अहम कदम उठाया है। कंपनी ने ग्लेशियर क्षेत्रों और नदी के उद्गम स्थलों के पास सीसीटीवी कैमरे लगाने शुरू कर दिए हैं, ताकि बर्फबारी के बाद हर गतिविधि पर लगातार नजर रखी जा सके।
ये कैमरे सैटेलाइट तकनीक से जुड़े होंगे और चौबीसों घंटे काम करेंगे। जैसे ही किसी जगह हिमस्खलन या बर्फ खिसकने की हलचल दिखेगी, उसकी जानकारी तुरंत परियोजना प्रबंधन और प्रशासन तक पहुंच सकेगी। इसका उद्देश्य समय रहते चेतावनी देना और जान माल के नुकसान को कम से कम करना है।
7 फरवरी 2021 सुबह 10:21 पर चमोली के रैणी गांव में बड़ी आपदा आई थी। यहां बर्फ, ग्लेशियर, चट्टान के टुकड़े, मोरेनिक मलबे आदि चीजें एक साथ मिक्स हो गए, जो करीब 8.5 किमी रौंथी धारा की ओर नीचे आ गये। करीब 2,300 मीटर की ऊंचाई पर ऋषिगंगा नदी को अवरुद्ध कर दिया, जिससे पानी की झील का निर्माण हुआ। रौंथी कैचमेंट से आए इस मलबे ने ऋषिगंगा नदी पर स्थित 13.2 मेगावाट क्षमता वाले हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर प्रोजेक्ट को तबाह कर दिया। इसके साथ ही रैणी गांव के पास ऋषिगंगा नदी पर नदी तल से करीब 70 मीटर ऊंचाई पर बना एक बड़ा पुल भी बह गया, जिससे नदी के ऊपर के गांवों और सीमावर्ती क्षेत्रों में आपूर्ति बाधित हो गई. यह मलबा आगे बढ़ा, जिसने तपोवन परियोजना को भी क्षतिग्रस्त किया।
उस दिन तेज धूप के बीच अचानक हिमस्खलन हुआ था, जिससे ऋषिगंगा जल विद्युत परियोजना पूरी तरह मलबे में दब गई थी। तपोवन में बन रही विष्णुगाड़ तपोवन परियोजना की सुरंग में भी भारी मात्रा में मलबा घुस गया था। इस हादसे में मजदूरों, इंजीनियरों और कर्मचारियों को संभलने तक का मौका नहीं मिला और 200 से अधिक लोगों की जान चली गई थी। इस दर्दनाक घटना के बाद से ही हिमालयी क्षेत्रों में काम कर रही कंपनियों पर सुरक्षा इंतजाम मजबूत करने का दबाव बना हुआ है।
अब माणा घाटी में पांडुकेश्वर से लगभग तीन किलोमीटर दूर अलकनंदा नदी पर स्थित विष्णुप्रयाग परियोजना के बैराज क्षेत्र को भी खास निगरानी में लिया गया है। यहां नदी के ऊपरी इलाकों में अक्सर हिमस्खलन होता रहता है, जिससे अचानक जलस्तर बढ़ जाता है। इसी खतरे को देखते हुए जेपी कंपनी ने माणा, बसुधारा, हनुमानचट्टी, खीरो नदी क्षेत्र और घस्तोली जैसे संवेदनशील स्थानों पर कैमरे लगाने की योजना बनाई है। कुछ जगहों पर कैमरे लगाने का काम शुरू भी हो चुका है।
ज्योतिर्मठ के उप जिलाधिकारी चंद्रशेखर वशिष्ठ ने बताया कि अलकनंदा नदी के उद्गम से लेकर परियोजना के बैराज तक अलग अलग स्थानों पर कैमरे लगाए जा रहे हैं। इसके लिए पहले सर्वे किया गया और उन जगहों को चुना गया जहां खतरा ज्यादा रहता है। इसका मुख्य मकसद परियोजना में काम करने वाले कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और किसी भी आपदा से होने वाले नुकसान को कम करना है।
स्थानीय लोगों के लिए रैणी आपदा की यादें आज भी ताजा हैं। तपोवन के रहने वाले संदीप नौटियाल बताते हैं कि उस दिन धौली गंगा में अचानक आया पानी का सैलाब देखकर गांव में चीख पुकार मच गई थी। हर तरफ अफरा तफरी थी और किसी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। लोगों का कहना है कि अगर उस समय समय पर चेतावनी मिल जाती, तो शायद कई जानें बचाई जा सकती थीं।
इसी अनुभव से सबक लेते हुए अब कंपनियां और प्रशासन तकनीक की मदद से पहले से सतर्क रहने की कोशिश कर रहे हैं। कैमरों और अलार्म सिस्टम के जरिए हिमस्खलन पर नजर रखी जाएगी, ताकि भविष्य में रैणी जैसी भयावह त्रासदी से लोगों को बचाया जा सके और पहाड़ों में रहने वालों के मन से डर को कुछ हद तक कम किया जा सके।

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