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सीएम धामीं का एक और ‘गेमचेंजर’ प्लान, उत्तराखण्ड की बंजर ज़मीनों पर खुशबू का कारोबार, कैसे होगा किसानों को फायदा, पूरा समझिए

देहरादून- मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उत्तराखंड की खेती के भविष्य को नई दिशा देने वाली महक क्रांति नीति का शनिवारको
औपचारिक शुभारंभ कर दिया। यह नीति देश में अपनी तरह की पहली पहल मानी जा रही है, जिसका उद्देश्य बंजर और अनुपयोगी पड़ी जमीन को किसानों के लिए कमाई का मजबूत साधन बनाना है। सरकार का लक्ष्य है कि सुगंधित फसलों की खेती के जरिए किसानों की आमदनी बढ़े, पलायन रुके और राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था को नई पहचान मिले।
मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर कहा कि उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति और जलवायु सुगंधित फसलों के लिए बेहद अनुकूल है। लंबे समय से जंगली जानवरों, मौसम की मार और कम आमदनी के कारण किसान खेती से दूर होते जा रहे थे। महक क्रांति नीति इसी समस्या का समाधान है। इससे न केवल किसानों को बेहतर आय मिलेगी, बल्कि बंजर पड़ी जमीन भी फिर से उपयोग में आ सकेगी।

महक क्रांति नीति क्या है ?
महक क्रांति नीति अगले दस वर्षों के लिए लागू की गई है। इसके तहत किसानों को सुगंधित फसलों की खेती के लिए पचास से अस्सी प्रतिशत तक की सरकारी सहायता दी जाएगी। सरकार का अनुमान है कि इस नीति पर करीब 1127 करोड़ रुपये खर्च होंगे और आने वाले वर्षों में एरोमा सेक्टर का सालाना कारोबार एक हजार करोड़ रुपये से अधिक पहुंच सकता है। इससे हजारों नए रोजगार भी पैदा होंगे।

एलोमा वैली कहां बनेंगी ?
इस नीति के तहत राज्य में सात एरोमा वैली विकसित की जाएंगी। चमोली और अल्मोड़ा में डेमस्क गुलाब की खेती को बढ़ावा मिलेगा। चंपावत और नैनीताल में दालचीनी, पिथौरागढ़ में तिमूर वैली, हरिद्वार और पौड़ी में लेमनग्रास तथा ऊधम सिंह नगर और हरिद्वार में मिंट वैली विकसित की जाएगी। इन क्षेत्रों में प्रोसेसिंग, भंडारण और बाजार से जोड़ने की पूरी व्यवस्था बनाई जाएगी, ताकि किसानों को अपनी उपज बेचने में परेशानी न हो।

सैटेलाइट केंद्र बनेंगे
साथ ही विभिन्न जिलों में सैटेलाइट केंद्र भी बनाए जा रहे हैं। चंपावत के खतेड़ा में तेजपात, पिथौरागढ़ के बिसाड़ में तिमूर, उत्तरकाशी के रैथल में सुरई, चमोली के परसारी और अल्मोड़ा के ताकुला में डेमस्क गुलाब तथा देहरादून के भाऊवाला में सैटेलाइट केंद्र तेजी से विकसित किए जाएंगे। इन केंद्रों के जरिए किसानों को बीज, तकनीकी सलाह और बाजार से जुड़ी जानकारी मिलेगी।

जंगली जानवरों से छुटकारा
फिलहाल राज्य में करीब दस हजार हेक्टेयर क्षेत्र में बाईस हजार से अधिक किसान सुगंधित फसलों की खेती कर रहे हैं। सरकार का मानना है कि इस खेती से मानव और वन्यजीवों के बीच होने वाले टकराव में भी कमी आएगी, क्योंकि जंगली जानवर आमतौर पर इन फसलों को नुकसान नहीं पहुंचाते। इससे किसानों की फसल सुरक्षित रहेगी और उनका भरोसा खेती में बना रहेगा।
कृषि और उद्यान मंत्री गणेश जोशी ने कहा कि महक क्रांति नीति उत्तराखंड के किसानों के लिए गेम चेंजर साबित होगी। जिन किसानों ने जंगली जानवरों और नुकसान के डर से खेती छोड़ दी थी, वे अब दोबारा खेतों की ओर लौट सकेंगे। सुगंधित फसलों से कम लागत में बेहतर आमदनी संभव है।

2002 में हुई थी महक खेती
उत्तराखंड में सुगंधित खेती की शुरुआत वर्ष 2002 में हुई थी, जब सुगंध पौधा केंद्र की स्थापना की गई। उस समय राज्य में महज दो सौ हेक्टेयर क्षेत्र में मेंथा और कुछ अन्य सुगंधित फसलें होती थीं और सालाना कारोबार केवल दो करोड़ रुपये था। धीरे धीरे यह दायरा बढ़ता गया। आज राज्य में 109 क्लस्टरों के तहत करीब दस हजार हेक्टेयर में तीस हजार से अधिक किसान सुगंधित खेती कर रहे हैं और कारोबार सौ करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है।
महक क्रांति नीति के साथ सरकार अब इस क्षेत्र को नई ऊंचाइयों तक ले जाना चाहती है। यह नीति खेती और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने का प्रयास है, जहां प्रकृति के अनुकूल खेती से किसानों की आय भी बढ़ेगी और राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी। उत्तराखंड की जमीन से अब सिर्फ अनाज नहीं, बल्कि खुशबू भी निकलेगी, जो किसानों के जीवन में समृद्धि और स्थिरता लेकर आएगी।

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