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The Heroic Tale of  Gaura devi -गौरा देवी की शौर्यगाथा

The Heroic Tale of  Gaura devi – चिपको आंदोलन ने जब दुनिया का ध्यान खींचा तो इसके शीर्षस्थ नेताओं को अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि मिली लेकिन आंदोलन की प्राणशक्ति गौरा देवी और उसका दर्द अपरिचित रह गया। पिछले साल चिपको की स्वर्ण जयंती भी आई-गई सी रही और गौरा की याद किसी को नहीं आई। आज यदि पर्यावरण संरक्षण का विचार नित नए सकंल्पों साथ जोर देश व दुनिया के लिए एक चिरस्थायी सिद्धांत बना है तो इसका प्रेरणा स्रोत गौरा है। उसकी शौर्यगाथा के बिना चिपको और वन संरक्षण का इतिहास अधूरा है। The Heroic Tale of  Gaura devi

वह भारत ही है जिसने ‘चिपको’ व जैसी कालजयी अवधारणा जन्म दिया और इसे स्थानीय या राष्ट्रीय चिन्ता के दायरे से निकाल कर पर्यावरण का वैश्विक सरोकार बना दिया । चिपको आज अपने मूल रूप में कहीं नहीं है और पर्यावरण की अंतरराष्ट्रीय चेतना अथवा दर्शन में आत्मसात हो चुका है। लेकिन यदि कोई अन्वेषी इस चेतना का स्रोत ढूढ़ने निकलना चाहे तो निसंदेह उसके कदम उत्तराखंड के सुदूर चमोली जिले के रैणी गांव में पहुंचकर ही थमेंगे। रैणी भारत-चीन सीमा पर बसा एक जनजातीय गांव है। विडंबना यह कि जिस रैणी गांव ने पेड़ों पर चिपकने के स्थूल नजरिये की बजाय वनों के प्रति वात्सल्य और ममत्व का गहन मंत्र दिया और चिपको आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी को एक सिद्धांत के रूप में स्थापित किया, वही रैणी आज ऋषिगंगा और धौलीगंगा की विनाशक बांध परियोजनाओं के कारण विस्थापन का त्रास झेल रहा है। गांव के कई मकान दरारों और भूधंसाव के कारण खाली करने पड़े हैं। इनमें गौरा देवी का स्मारक भी है जो ध्वस्त हो चुका है। वही गौरा जिसकी अमर गाथा के बिना चिपको का इतिहास अधूरा है। The Heroic Tale of  Gaura devi –

मार्च 1974 को रैणी की इस वनवासी महिला का साहस ‘चिपको’ का पहला सफल परीक्षण था जिसमें सरकार को चमोली जिले के 1200 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को संवेदनशील मानना पड़ा और वहां अगले दस साल तक वन कटान पर रोक लगानी पड़ी। यह वैज्ञानिक नजरिया भी शासन ने पहली बार स्वीकार किया कि बाढ़ और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाएं वन कटान की देन हैं। वनों के प्रति वात्सल्य और ममत्व का मंत्र गौरा के भीतर आम पहाड़ी महिला की तरह रोजमर्रा के श्रमसाध्य जीवन के अनुभवों पर आधारित था जिसमें जंगल स्त्री का मायका है और वहां विराजती वनस्पतियां मायके की नियामत | बचपन से ही जंगल को इसी भाव से देखती आई गौरा का सब्र टूटना तब स्वाभाविक था, जब ‘मायके’ पर आरे – कुल्हाड़े चलाने आए मालदारों और उनके कारिंदों से सामना हुआ। तभी तो गौरा उनकी बंदूक के आगे छाती खोलकर गरज उठी- ‘लो मारो गोली और काट ले जाओ हमारा मायका……। गौरा को क्या मालूम कि जंगल बचाकर उसने अनायास ही पर्यावरण संरक्षण की ऐसी अंतरराष्ट्रीय क्रांति के द्वार खोल दिए थे जो आने वाले वर्षों में भूमंडलीय खतरों से जुड़े संगीन सवालों को सतह पर लाने वाली थी। The Heroic Tale of  Gaura devi –

आइए, रैणी के उस ऐतिहासिक प्रसंग की चर्चा करें। 3 जनवरी 1974 को देहरादून के टाउनहॉल के बाहर प्रतिरोध का एक विलक्षण दृश्य था । अंदर ठहाके लगाते बड़े-बड़े इजारेदार और सरकार की मजबूत लॉबी पेड़ों की नीलामी का फैसला ले रही थी और बाहर एक अकेला शख्स हाथ में पर्चा लेकर नीलामी के विरोध में खड़ा था। विरोध भी ऐसा, जिसमें सिर्फ अंतरआत्मा व चेतना जगाने का प्रयास और पेड़ों को न काटने की अनुनय-विनय थी। गेट पर खड़ा यह इकलौता व्यक्ति अंदर जाते हर बोलीकर्ता को इशारे से पास बुलाता और हाथ में लिया पोस्टर पढ़ाकर नीलामी में भाग न लेने की गुजारिश करता । पोस्टर पर सबसे ऊपर शीर्षकनुमा वाक्य था- ‘मानव जाति के कल्याण के लिए …..| आगे पेड़ों की हिफाजत की अपील थी । The Heroic Tale of  Gaura devi

लेकिन बोलीकर्ताओं / ठेकेदारों के लिए वह शख्स सिर्फ उपहास का पात्र था क्योंकि नीलामी रुकने का सवाल ही नहीं था। दोपहर होते-होते खबर आ गई कि चार लाख 71 हजार की रकम में रैणी का जंगल नीलाम हो गया। जंगल से कुल 2451 पेड़ कटने थे। इसके बाद वह व्यक्ति बोली छुड़ाने वाले मालदार को यह ताकीद कर लौट आया कि अब रैणी में आपका ‘चिपको’ से सामना होगा। The Heroic Tale of  Gaura devi –

यह शख्स और कोई नहीं, संसार में चिपको के प्रणेता के रूप में पहचाने गए श्री चंडी प्रसाद भट्ट थे। वह गोपेश्वर में एक संस्था चलाते थे- दशोली ग्राम स्वराज संघ | यह संस्था वनों के आसपास रहने वाले ग्रामीणों को वनोपज के माध्यम से रोजगार मुहैया कराने का साधन थी और कुटीर उद्योग के रूप में काष्ट कला केंद्र चलाती थी। वन विभाग से ग्रामीणों को मिलने वाले अंगू के पेड़ों से हल, बैलों का जुआ और खेती- किसानी के अन्य औचार बनाए जाते थे। लेकिन वन विभाग ने इकतरफा फैसले में अचानक दशौली ग्राम स्वराज संघ को पेड़ों का आवंटन रोक दिया और दूसरी ओर खेलकूद का सामान बनाने वाली इलाहाबाद की साइमन कंपनी को गोपेश्वर के पास मंडल नामक क्षेत्र में अंगू के पेड़ काटने की इजाजत दे दी।

आक्रोशित ग्रामीणों ने तय किया कि वे पेड़ नहीं कटने देंगे। लेकिन कैसे, कोई राह नहीं सूझ रही थी। 30 मार्च 1973 को चंडी प्रसाद भट्ट और उनके सहयोगी चिंतामग्न थे कि साइमन कंपनी के लोगों के गोपेश्वर पहुंचने की खबर मिली । सुनते ही भट्ट तमतमा उठे और चिल्लाए – ‘साइमन वालों, सुन लो हम पेड़ नहीं कटने देंगे। वे कुल्हाड़े चलाएंगे, हम पेड़ों पर ‘ अंग्वाल’ मार देंगे। (अंग्वाल यानी आलिंगन ) । हम पेड़ों पर चिपक जाएंगे। कुल्हाड़े का पहला वार हमारी पीठ पर चलेगा…..।’ अनायास एक ऐसे शब्द की उत्पत्ति हो चुकी थी जिसकी गूंज पूरे संसार में सुनाई देने वाली थी और जो धरा पर

मानव के अस्तित्व के लिए वरदायी साबित होने वाला था। मंडल में अंगू के पेड़ों पर चिपकने की नौबत बेशक न आई हो, मगर जंगल बचा लिया गया। ‘चिपको’ जैसी अहिंसक क्रांति का स्रोत फूट चुका था जिसकी पहली परख रैणी में होने वाली थी। The Heroic Tale of  Gaura devi –

रैणी का जंगल नीलाम हो चुका था। इसे अंतिम दम तक रोकने की कोशिशें असफल हो गईं, मगर आंदोलनकारियों के हौसले में कोई कमी नहीं आई। उधर ठेकेदार को परमिट मिला तो इधर गोपेश्वर और जोशीमठ में भारी विरोध प्रदर्शन हुए। गांव-गांव सभाएं हुई और पारंपरिक गाजे-बाजों के साथ जन-जागरूकता अभियान चलाए गए । मगर प्रशासन पीछे हटने को तैयार नहीं था। पेड़ काटने के लिए तारीख तय हो चुकी थी- 26 मार्च 1974 | आरा – कुल्हाड़ों और राशन की बोरियों के साथ 18 मार्च को मजदूरों का दल जोशीमठ पहुंच गया। इधर, चंडी प्रसाद भट्ट को बातचीत का भरोसा दिलाकर यह कहते हुए गोपेश्वर में ही रोक लिया कि गढ़वाल वन वृत के सर्वोच्च अधिकारी उनसे वार्ता करने 25 तारीख गोपेश्वर आएंगे। बातचीत हुई, पर चूंकि मकसद श्री भट्ट को उलझाए रखना था, लिहाजा इधर-उधर की बातों के बाद दो टूक कह दिया गया कि कटान नहीं रोका जाएगा। श्री भट्ट को रैणी न जाने की भी ताकीद कर दी गई। The Heroic Tale of  Gaura devi –

अगले ही दिन यानी 26 मार्च को एक सर्वोदयी कार्यकर्ता ने खबर दी कि मजदूर रैणी पहुंच गए हैं और मलारी, रैणी व लाता गांवों के सारे पुरुष सुबह से ही जिला मुख्यालय चमोली बुला लिए गए हैं। असल में भारत-चीन युद्ध के दौरान 1962 में इन सीमावर्ती गांवों की जमीन पर सेना को कई चौकियां बनानी पड़ी थीं। इस जमीन का मुआवजा ग्रामीणों को आज तक नसीब नहीं हुआ था। प्रशासन ने 14 साल के बाद मुआवजे के लिए यदि 27 मार्च की तारीख तय की थी तो उसकी मंशा बहुत साफ थी कि मुआवजे के लालच में सारे पुरुष गांव छोड़कर चमोली चले आए और मौके के फायदा उठाकर मजदूर रैणी में पेड़ों पर कुल्हाड़े चला दें। The Heroic Tale of  Gaura devi –

मजदूरों के जंगल में दाखिल में होने की खबर मिलने के बावजूद भट्ट असहाय थे क्योंकि गोपेश्वर से रैणी अगले दिन ही पहुंचा जा सकता था। लेकिन अगली सुबह शुभ संदेश लेकर आई। जोशीमठ से चमोली आने वाली पहली बस से उतरे लोगों ने सूचना दी कि रैणी का घना जंगल बचाया जा चुका है और वहां की महिलाओं ने एक भी पेड़ पर आंच नहीं आने दी। हतप्रभ करने वाली यह खबर बहुत तेजी से फैली तो आसपास के इलाकों से गाजे-बाजों के साथ चिपको कार्यकर्ता चंडी प्रसाद भट्ट की अगुआई में रैणी को चल पड़े। The Heroic Tale of  Gaura devi –

आइए, जानते हैं रैणी में पहले दिन यानी 26 मार्च को क्या हुआ। सुबह कड़ाके की सर्दी के बीच मजदूरों और राशन से लदी बस जोशीमठ से करीब 26 किलोमीटर ऊपर रैणी को चल पड़ी। बस के साथ एक जीप भी थी जिसमें वनकर्मी थे। ये सभी लोग रैणी से कुछ पहले ही उतर गए और ऋषिगंगा के किनारे-किनारे खुद को छिपाते हुए चोर रास्ते से जंगल की ओर बढ़ने लगे। मजदूरों में ज्यादातर हिमाचली थे और उन्होंने अपनी पहचान छिपाने के लिए पारंपरिक गादी टोपियां उतारकर जेबों में डाल ली थीं। तभी गांव की एक लड़की ने मजदूरों को देख लिया। खतरे को भांपकर वह भागते हुए गौरा देवी के पास पहुंची और एक सांस में सारी बात कह गई। गौरा के माथे पर शिकन गहरा गई। गांव के सारे पुरुष तो कथित मुआवजा लेने चमोली गए हुए थे। इस नाजुक घड़ी में तत्काल कुछ करना जरूरी था। गौरा के भीतर का साहस निर्णय ले चुका था। वह सबसे पहले बगल के घर में गईं और खाना बना रही महिला को बाहर बुलवा लिया। इसके बाद देखते ही देखते अन्य घरों से महिलाएं और बेटियां सारा चौका – पानी छोड़ इकट्ठा हो गईं। The Heroic Tale of  Gaura devi –

21 महिलाओं और कुछ बेटियों वाला यह मातृशक्ति समूह एक संकल्प के साथ जंगल की ओर बढ़ चला । महिलाएं जल्द ही जंगल में उस जगह पर पहुंच गईं जहां मजदूरों, ठेकेदार के

प्रतिनिधियों और वन कर्मियों की अच्छी । खासी तादात जमा थी। एक तरफ खाना बन रहा था जो दूसरी तरफ कुल्हाड़ों को पत्थरों पर घिस कर धार दी जा रही थी। मौके पर अचानक महिलाओं के जत्थे को देख वे सकते में आ गए। जत्थे की अगुआई कर रही गौरा ने प्रेम से समझाया- ‘भाईयों यह जंगल हमारा मायका है। ये पेड़ हमारे ऋषि हैं। यहां देवताओं का वास है। यहां से हमें जड़ी-बूटी, कंदमूल, घास और लकड़ी मिलती है। जंगल कटेगा तो सारा पहाड़ टूटकर नीचे आ जाएगा, बाढ़ आएगी। हमारे खेतों और और बगड़ों को बहा ले जाएगी। हमारे मर्द अभी गांव में नहीं हैं। वे आएंगे तो फैसला कर लेना। आप लोग खाना खा लो और फिर हमारे साथ नीचे चले चलो। हम जंगल नहीं कटने देंगी। .. The Heroic Tale of  Gaura devi –

जवाब में ठेकेदार के नुमाइंदे और वन विभाग के कर्मी बदतमीजी पर उतर आए। इनमें से कुछ नशे में थे। औरतों को धमकाने लगे और सरकारी काम

में बाधा डालने के लिए गिरफ्तारी का भय दिखाने लगे। पर मातृशक्ति जरा भी विचलित नहीं हुई। नशे में झूम रहा एक वनकर्मी बंदूक लेकर गौरा की तरफ बढ़ा और निशाना साध लिया। यह देख गौरा का साहस उबल कर बाहर आ गया। वह

अपनी छाती खोलकर गरज उठीं- ‘लो मारो बंदूक ओर काट ले जाओ हमारा मायका । ….. गौरा की इस ललकार पर सारा माहौल सहम उठा । मातृशक्ति के आगे मजदूरों के पांव उखड़ चुके थे और वे जंगल छोड़कर नीचे की ओर खिसकने लगे। पर अभी भी कुछ वनकर्मी और ऐजेंट ऐसे थे जो नशे में महिलाओं को बुरा-भला बकते हुए इस शर्त पर अड़े थे कि वे पैदल नहीं, पालकी में बैठकर जाएंगे। बहरहाल उन्हें भी अंततः मातृशक्ति के आगे झुकना पड़ा। मजदूर जंगल से खदेड़े जा चुके थे। नीचे उतर रही महिलाओं ने ऋषिगंगा पर बनी सीमेंटेड पुलिया को भी तोड़ दिया ताकि जंगल जाने का रास्ता ही बंद हो जाए। अब मजदूर नीचे सड़क के किनारे गौरा महिलाओं को लेकर रातभर जंगल पर घेरा डाले रहीं। अगले दिन चंडी प्रसाद भट्ट व अन्य लोग दोपहर तक रैणी में उस जगह पहुंचे, जहां ये वीरांगनाएं डटी हुई थीं। The Heroic Tale of  Gaura devi –

गौरा देवी से अपनी मुलाकात के बारे में चंडी प्रसाद भट्ट ने लिखा है- ‘मैं उस दृश्य को कभी नहीं भूलंगा, जब उन्होंने मुझे सारी घटना की जानकारी दी और कहा कि बदले में वन विभाग के किसी भी कर्मचारी को न सताया जाए। गौरा बार-बार कह रही थीं- बेटा, इन लोगों ने जो दुर्व्यवहार हमारे साथ किया, उसकी जानकारी किसी को मत देना । बेचारों की नौकरी चली जाएगी। जंगल तो बच ही गया आगे भी हम पेड़ों की रक्षा करेंगे।… असल में सुबह ही एक वनकर्मी गौरा के पास आकर गुहार लगा चुका था कि नशे और बंदूक की बात किसी को न बताएं वरना उसकी नौकरी चली जाएगी। श्री भट्ट ने लिखा है- दुर्व्यवहार का बदला करुणा से चुकाया जाना मैंने पहली बार देखा था । …… इसी घटना को जाने-माने पर्यावरणविद और लेखक दिवंगत अनुपम मिश्र ने अपनी किताब में इस तरह सजीव किया है- ‘गौरा देवी ने कहा कि हमने जो किया, सो ठीक किया। अब हमें न कोई पछतावा है और न कोई डर। हमने मनुष्य तो मारा नहीं, प्रेम की बात की है। अब पुलिस भी पकड़ ले जाए तो कोई चिंता नहीं। हमने अपना मायका बचा लिया । …. अनुपम आगे लिखते हैं- ‘दोपहर ढलने के साथ ही सब नीचे उतर आए। औरतों के साथ आदमियों को देख मजदूर बुरी तरह घबरा गए। मगर श्री भट्ट ने उन्हें आश्वस्त किया कि डरो नहीं, हमारी आपसे कोई लड़ाई नहीं है। हमें तो बस जंगल बचाना था। श्री भट्ट ने वहां पर एक सभा को संबोधित किया। ऋषिगंगा के तेज हल्ले में हो रही यह सभा डर और तनाव के पलड़े को बराबरी पर ले आई। मजदूर भी सभा में आ गए। फिर एक मजदूर अपने सामान तक गया और एक बड़ी दरी उठा ले आया। सबने मिलकर उसे बिछा दिया। पेड़ों को काटने आए मजदूर और पेड़ों को बचाने उतरी औरतें उस दरी पर सटकर बैठ गए। अब प्रेम का पलड़ा डर के पलड़े से काफी भारी हो चुका था।’ The Heroic Tale of  Gaura devi – चिपको भले ही महिलाओं की समस्याओं को लेकर नहीं, सरकारों की वन व उद्योग नीति के विरोध में जन्मा था परंतु गौरा के प्रसंग ने इसमें पहाड़ी महिला के दर्द की वह स्याही घोल दी थी कि भविष्य में लिखे जाने वाली हर इबारत में इसी स्याही के इस्तेमाल का भरोसा पक्का हो चला था। लेकिन जल्द ही यह भरोसा टूटने लगा और इबारतें दर्द की इस स्याही की बजाय शासन की ‘हिना’ से लिखी जाने लगीं। अब पर्यावरण संरक्षण के संदेशों के साथ कड़ी कानूनी हिदायतें थी। अस्सी के दशक की शुरुआत ऐसे सख्त वन अधिनियमों से हुई कि जंगल से एक तिनका तक चुनना अपराध हो गया। रैणी की घटना के करीब दस साल बाद रैणी गांव पहुंची तत्कालीन शोधार्थी कुसुम नौटियाल से बातचीत में गौरा देवी की इस पीड़ा को देखें- ‘क्या मिला हमें यह लड़ाई जीत कर । तुमारे जैसा भौत आया भुली, लाखों लोग आया । सब एक ही बात पूछता गौरा देवी, कैसे बचाया तुमने जंगल, क्या किया, कैसे किया। हम तुम्हारा दुःख तकलीफ लिखेगा, सरकार तक पौछाएगा। पर इजु (मां) कुछ नहीं मिला। थक गया ह बताते-बताते। अब नहीं बताएगा।… गांव की ही एक अन्य महिला घूमा देवी बोलीं- ‘क्या करना दीदी, घास तो खो गया, अब गाय भी किसके सहारे पालनी। आसपास का गोचर तो सरकार ने मिलिटरी वालों को दे दिया। लाता का जंगल भी बंद कर दिया। कहां जाएंगे हमारे ढोर – डंगर चरने के लिए। ….. (वामा पत्रिका से जून 1984)

यह सच है कि चिपको ने जब दुनिया का ध्यान खींचा तो इसके शीर्षस्थ नेताओं को अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि मिली लेकिन गौरा देवी और उसका दर्द अपरिचित रह गया। आजीवन अभावों और घोर कष्टों से घिरी गौरा का जन्म वर्तमान नंदादेवी नेशनल पार्क के सीमान्त गांव लाता में हुआ था। 12 साल की उम्र में उनका विवाह रैणी के मेहबान सिंह से हुआ और मात्र 22 साल की उम्र में वह विधवा भी हो गईं। अपने आखिरी दिनों में वह पक्षाघात जैसी बीमारी से ग्रस्त रहीं । 4 जुलाई 1991 को गौरा ने अंतिम सांस ली। The Heroic Tale of  Gaura devi –

7 फरवरी 2021 को ऋषि गंगा और धौली में आए अप्रत्याशित सैलाब ने गौरा के गांव रैणी को जड़ से और भी खोखला कर दिया। यह विभीषिका 200 से अधिक लोगों को लील गई जिसमें कुछ रैणी गांववासी भी थे। गांव अब विस्थापन की गुहार लगा रहा है। गांव के जो मकान दरारों और भूधंसाव के कारण खाली करने पड़े हैं, उनमें गौरा देवी का स्मारक भी है। यहां स्थापित गौरा की प्रतिमा को प्रशासन इस वादे के साथ जोशीमठ ले गया है कि भविष्य में और भी बड़ा स्मारक बनाकर इसे पुनः प्रतिस्थापित किया जाएगा। पर क्या मालूम, तब तक गौरा का गांव रैणी बचा भी रहेगा कि नहीं! • The Heroic Tale of  Gaura devi –

व्योमेश चन्द्र जुगरान (वरिष्ठ पत्रकार)

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The Heroic Tale of  Gaura devi -गौरा देवी की शौर्यगाथा

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