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Uttarakhand School – उत्तराखंड में 4000 से ज्यादा स्कूल बंदी की कगार पर, क्यों नहीं खुल पा रहे नए स्कूल ?

देहरादून – उत्तराखंड में सरकारी स्कूलों की हालत लगातार कमजोर होती जा रही है। प्रदेश में चार हजार से ज्यादा सरकारी स्कूल ऐसे हैं जो बंद होने की कगार पर पहुंच चुके हैं। इन स्कूलों में छात्रों की संख्या दस या उससे भी कम रह गई है। सबसे हैरानी की बात यह है कि साल 2025 में प्रदेश में एक भी नया सरकारी स्कूल नहीं खुला। यह स्थिति तब है जब शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के नाम पर कई योजनाएं चलाई जा रही हैं और शिक्षा विभाग का बजट बारह हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा का है। उत्तराखंड के सरकारी प्राथमिक विद्यालयों और जूनियर हाईस्कूलों की जमीनी हालत बेहद चिंताजनक होती जा रही है। कई स्कूलों में एक या दो बच्चे ही पढ़ रहे हैं। कहीं तीन तो कहीं चार छात्र ही पूरे स्कूल का बोझ संभाल रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में 4275 सरकारी प्राथमिक विद्यालय ऐसे हैं जहां छात्रों की संख्या दस या उससे कम है। इन स्कूलों में सबसे ज्यादा संख्या पौड़ी जिले की है, जहां ऐसे 904 स्कूल हैं। दूसरी ओर हरिद्वार जिले में इस तरह के स्कूलों की संख्या सबसे कम है, जहां केवल तीन स्कूलों में ही छात्रों की संख्या दस या उससे कम है। कुछ यही हाल जूनियर हाईस्कूलों का भी है। प्रदेश में 650 जूनियर हाईस्कूल ऐसे हैं जहां पढ़ने वाले बच्चों की संख्या दस या उससे कम रह गई है। इनमें भी पौड़ी जिला सबसे आगे है, जहां 120 जूनियर हाईस्कूलों में बच्चों की संख्या बेहद कम है। यह तस्वीर बताती है कि पहाड़ी जिलों में सरकारी स्कूलों से बच्चों का भरोसा तेजी से टूट रहा है। यह स्थिति तब है जब सरकारी स्कूलों में शिक्षा सुधार के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। समग्र शिक्षा योजना, प्रधानमंत्री पोषण योजना, मुख्यमंत्री मेधावी छात्र प्रोत्साहन छात्रवृत्ति योजना और बालिका शिक्षा प्रोत्साहन योजना जैसी योजनाओं पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। बच्चों को मुफ्त किताबें, यूनिफॉर्म, दोपहर का भोजन और छात्रवृत्ति जैसी सुविधाएं भी दी जा रही हैं। इसके बावजूद सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या लगातार घट रही है। शिक्षा विभाग ने बीते कुछ वर्षों में कई नए प्रयोग भी किए। कहीं अटल उत्कृष्ट विद्यालय बनाए गए, कहीं पीएम श्री स्कूल शुरू किए गए, तो कहीं क्लस्टर विद्यालयों की योजना लाई गई। इनका मकसद सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदलना और बच्चों को बेहतर शिक्षा देना था।

लेकिन इन प्रयासों के बाद भी जमीनी हकीकत नहीं बदली। छात्रों की संख्या बढ़ने के बजाय और कम होती चली गई। आंकड़े और भी चिंता बढ़ाने वाले हैं। प्रदेश के 2940 सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में छात्रों की संख्या बीस या उससे कम रह गई है। वहीं 1327 स्कूल ऐसे हैं जहां बच्चों की संख्या तीस या उससे कम है। इसके अलावा 1062 स्कूलों में छात्रों की संख्या पचास या उससे कम रह गई है। इसका मतलब यह है कि हजारों स्कूल ऐसे हैं जहां शिक्षक तो तैनात हैं, भवन भी हैं, योजनाएं भी चल रही हैं, लेकिन बच्चे नहीं हैं। ग्रामीण इलाकों में रहने वाले कई अभिभावकों का कहना है कि वे अपने बच्चों को बेहतर भविष्य देना चाहते हैं। इसी वजह से वे सरकारी स्कूलों की बजाय निजी स्कूलों का रुख कर रहे हैं। कुछ लोग शहरों की ओर पलायन कर चुके हैं, जिससे गांवों में बच्चे ही नहीं बचे। कई स्कूल ऐसे हैं जहां पूरा गांव खाली हो चुका है या बुजुर्ग ही रह गए हैं। इसका सीधा असर स्कूलों की छात्र संख्या पर पड़ा है। शिक्षकों की चिंता भी कम नहीं है। कई शिक्षक ऐसे स्कूलों में तैनात हैं जहां पढ़ाने के लिए गिने चुने बच्चे ही हैं। उनका कहना है कि शिक्षक और स्कूल को सिर्फ योजनाओं से नहीं, बल्कि भरोसे से जिंदा रखा जा सकता है। जब अभिभावकों का भरोसा सरकारी शिक्षा से उठ जाता है, तो फिर बजट और योजनाएं भी बेअसर हो जाती हैं। कुछ शिक्षक यह भी मानते हैं कि नए साल के साथ नई उम्मीद जगी है। उनका कहना है कि अगर शिक्षा विभाग जमीनी स्तर पर काम करे, शिक्षकों की जवाबदेही तय हो और बच्चों की जरूरत के हिसाब से पढ़ाई का माहौल बने, तो सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदली जा सकती है। अभिभावकों को यह भरोसा दिलाना जरूरी है कि सरकारी स्कूलों में भी बच्चों का भविष्य सुरक्षित है।

उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में सरकारी स्कूल सिर्फ पढ़ाई का केंद्र नहीं होते, बल्कि गांव की पहचान और जीवन रेखा भी होते हैं। जब स्कूल बंद होते हैं, तो गांव और ज्यादा सूने हो जाते हैं। यही वजह है कि चार हजार से ज्यादा स्कूलों का बंदी की कगार पर पहुंचना सिर्फ शिक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है। अब सवाल यह है कि नया साल क्या नई दिशा देगा। क्या सरकारी स्कूलों में फिर से बच्चों की हंसी लौटेगी। क्या योजनाएं कागज से निकलकर जमीन पर असर दिखाएंगी। जवाब आने वाला वक्त देगा, लेकिन फिलहाल तस्वीर गंभीर है और इस पर तुरंत और ईमानदार कदम उठाने की जरूरत साफ नजर आ रही है।

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